-
This is Slide 1 Title
This is slide 1 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
-
This is Slide 2 Title
This is slide 2 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
-
This is Slide 3 Title
This is slide 3 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
भारतीय दर्शन; वसुधैव कुटुम्बकम
मंगल-चाँद पर पहुँचते कदमों और घण्टों-महीनों की दूरियाँ पलों में मापते चमचमाते विमानों के दौर में क़बीलाई मानसिकता से चिपके रहने की समाज के एक तबक़े की जिद्द और जुनून सामान्य मानवी की समझ से परे है| सभ्य समाज ऐसे दुराग्रहों को छोड़कर आगे बढ़ने का मार्ग तलाशता है|
शबरी के राम
"शबरी के राम"
सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण :

एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर फूटे :
"कहो राम! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?"
राम मुस्कुराए :
"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल?"
"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे।
यह भी नहीं जानती थी,
कि तुम कौन हो?
कैसे दिखते हो?
क्यों आओगे मेरे पास?
बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।
राम ने कहा :
"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।”
एक बात बताऊँ प्रभु! भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला ‘मर्कट भाव’ और दूसरा ‘मार्जार भाव’।
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया।
"मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना" (मार्जार भाव)
बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न। उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। (मर्कट भाव)
राम मुस्कुरा कर रह गए।
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया।
"मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना" (मार्जार भाव)
बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न। उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। (मर्कट भाव)
भीलनी ने पुनः कहा :
"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं। तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते?”
राम गम्भीर हुए, बोले :
भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने के लिए ही आया है?” रावण का वध तो, लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता था।
राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था।”
जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि "नहीं, यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"
राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा तभी वह रामराज्य कहलायेगा।"
राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है मां!
माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं।
जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि "नहीं, यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"
राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा तभी वह रामराज्य कहलायेगा।"
राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है मां!
राम ने फिर कहा :
राम की वन यात्रा मात्र रावण युद्ध के लिए ही नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।” राम निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना 'राम' होना है।”
राम निकला है ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”
राम आया है, ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है।”
राम आया है, ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय।”
और
राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।”
सबरी की आँखों में जल भर आया था।
उसने बात बदलकर कहा :
"बेर खाओगे राम?”
राम मुस्कुराए,
"बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया।
राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :
"बेर मीठे हैं न प्रभु?”
"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”
शबरी मुस्कुराईं, बोली :
"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"
✍️अज्ञात
भारतीय सामान-हमारा अभिमान
भारत सरकार द्वारा टिकटोक समेत 59 चीनी apps पर बैन लगाने के फैसले का चहुँओर से स्वागत हो रहा है। इन apps के विकल्प के रूप में कई भारतीय apps उभर कर आ रही है। चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का असर भी पूरे देश में देखा जा सकता है। इसका सबसे बुरा प्रभाव चीनी मोबाइल कम्पनियों पर पड़ा है। Xiomi को तो अपने स्टोर्स पर Made in India के बैनर लगा अपना ब्रांड name छुपाना पड़ा है।
महाभारत काल के प्रसंग वयं पंचाधिकं सतम ध्येय वाक्य को ध्यान में रखकर देश की जनता चीनी वस्तुओं के बहिष्कार पर एकमत हो रही है।
कन्फडरेशन आॅफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) द्वारा 19 जून से 27 जून के मध्य देश में विभिन्न वर्गों के बीच चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार के सम्बन्ध में पूछे गए प्रश्नों के प्रत्युत्तर में शत प्रतिशत (अपवाद को छोड़कर) लोगों ने चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया है।
विभिन्न वर्गों (व्यापारियों, किसानों, उपभोक्ताओं, महिलाओं, विधार्थी व सामाजिक संगठनों) से सर्वे में चीन के साथ चल रहे वर्तमान हालात से संबंधित नौ प्रश्न भी पूछे गए थे,सर्वे में भाग लेने वाले लगभग सभी वर्गो ने चीन के प्रति आक्रोश प्रकट करते हुए, चीन के विरुद्ध और आक्रामक कार्यवाही का समर्थन किया। कैट के इस सर्वे से यह साफ प्रकट होता है कि इस मुद्दे पर सारा देश चीन के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा है और किसी भी कीमत पर अब चीन को सबक सिखाना चाहता है।
इस सर्वे में शामिल लोगों में से 97.8 प्रतिशत लोगों ने यह संकल्प भी लिया कि वह चीनी सामान न खरीदेंगे और न ही बेचेंगे। इसके अलावा अन्य सवालों के जवाब भी लगभग भारत सरकार की वर्तमान नीति को ही पुष्ट करते हैं।
इस सर्वे से उत्साहित होकर कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सर्वे के नतीजों से कैट को अब और अधिक आक्रामकता के साथ देशभर में चीनी वस्तुओं के राष्ट्रीय अभियान 'भारतीय सामान -हमारा अभिमान' को चलाने को बल मिलेगा।
✍️
गंगा सिंह राजपुरोहित
वन कविता
कितने फूल तितलियां पक्षी आंगन में।
देखो कितनी कविताएं होती वन में।
कलुषित कूड़ा जब बाहर हो जाता है ,
कृष्ण अवतरित होते मन वृंदावन में।
एक सितारा धरती को संदेशा दे
सुमन खिले तब सूरज के अभिनंदन में।
सांपों में तो वो ही जहर भरा करता,
सौरभ संग रखे शीतलता चंदन में।
ना जल, ना कुमकुम उपचार न फल मेवा,
सिर्फ समर्पण भाव रखें प्रभु-वंदन में।
उसकी आभा से आभासित जग सारा,
जड़ में जड़वत्, क्रीड़ारत वह चेतन में।
रावण तो मन में अधिकांश रखा करते,
कुछ के ही प्रमोदमय राम यहां मन में।
✍️
प्रमोद श्रीमाली
चीन की काली करतूतों पर विपक्षी दलों की भयावह चुप्पी......!
आज संपूर्ण भारत वर्ष विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, आक्रामक चीन और वहाँ की तानाशाह सरकार की दादागिरी के प्रति आक्रोशित और क्षुब्ध है| 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के पश्चात यह क्षोभ और आक्रोश अपने चरम पर है| भारतीय सैनिकों पर उसका यह हमला सुनियोजित था| बताया तो यहाँ तक जाता है कि चीनी सैनिक लाठी-डंडों पर नुकीले लोहे की तार बाँधकर आए थे और कुछ ने तो चाकू तक छुपा रखा था|
ध्यातव्य हो कि चीन के प्रति देशवासियों का यह क्षोभ और आक्रोश तात्कालिक प्रतिक्रिया या क्षणिक उत्तेजना मात्र नहीं है| वास्तविकता तो यह है कि 1962 में चीन के हाथों तत्कालीन काँग्रेसी नेतृत्व के एकपक्षीय आत्म-समर्पण को भारतीय जनमानस ने कभी हृदय से स्वीकार नहीं किया| उस शर्मनाक पराजय से भले ही तत्कालीन नेतृत्व और उनके उत्तराधिकारियों को कोई खास फ़र्क न पड़ा हो, पर भारत का देशभक्त जनसमुदाय उस अपमान की आग में सदैव जलता रहा है और उस अपमान की आग में घी का काम करती रही है,।
सीमावर्त्ती क्षेत्रों में चीन की लगातार घुसपैठ; थोड़े-थोड़े अंतरालों के पश्चात भारतीय भूभागों का अतिक्रमण, वास्तविक नियंत्रण-रेखा के अति समीपवर्त्ती क्षेत्रों में उसकी सैन्य एवं सामरिक गतिविधियाँ, कभी सियाचीन, कभी नाथुला, कभी डोकलाम तो कभी गलवान में भारतीय सैनिकों के साथ उसकी हाथापाई एवं हिंसक झड़पें|
सच्चाई यह है कि भारत ने भले चीन के साथ हुई तमाम संधियों का वचनबद्धता के साथ पालन किया हो, पर चीन ने कभी भी सहयोग और शांति की किसी संधि का सम्मान नहीं किया| ऐसा नहीं कि उसका यह रवैया केवल भारत वर्ष के प्रति रहा हो, बल्कि उसने अपने सभी पड़ोसी देशों की एकता, अखंडता और संप्रभुता के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ अवश्य किया है, उन पर कभी-न-कभी आँखें तरेड़ी हैं, सीमाओं का अतिक्रमण किया है|
चीन की इन हरकतों और हिमाकतों से जहाँ एक ओर पूरा विश्व आक्रोशित एवं क्षुब्ध है, वहीं अपने कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं का चीन को लेकर रुख़ हैरान करने वाला है| वे चीन के इस विस्तारवादी-आक्रामक रवैय्ये में भी अपने लिए एक अवसर ढूँढ़ रहे हैं|
हर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी एवं विपक्षी पार्टियों को सरकार से प्रश्न पूछने, उसकी आलोचना करने की आज़ादी मिलती है और मिलनी भी चाहिए परंतु भारत इकलौता देश है, जहाँ की विपक्षी पार्टियाँ राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करती हैं, युद्ध-काल में भी अपनी सरकार को घेरती है| ऐसे-ऐसे वक्तव्य ज़ारी करती हैं, जिनका सीधा लाभ देश के दुश्मनों को मिलता है| वे अपनी ही सेना का मनोबल तोड़ती हैं और देश के शक्ति-बोध एवं सामूहिक बल को कमज़ोर करती हैं| करुणा और संवेदना जताने के नाम पर ज़ारी वक्तव्य, चलाया गया विमर्श कब क्रूर उपहास में परिणत हो जाता है, यह कदाचित राजनीति के इन सिद्धहस्त व सत्तालोभी खिलाड़ियों को भी नहीं मालूम!
घोर आश्चर्य है कि इनके अनुयायी और समर्थक-वर्ग बिना सोचे-विचारे उसी विमर्श और उससे निकले निष्कर्ष को आगे बढ़ाते रहते हैं और यदि मालूम होते हुए भी वे ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें ''नर-गिद्ध' कहना अनुचित नहीं! जीवन को उत्सव मानने वाले देश में अब क्या ''मृत्यु का भी सामूहिक उत्सव' मनाया जाएगा?
जो वामपंथी कला, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में भी तथाकथित सामंतवाद, साम्राज्यवाद, असहिष्णुता, अधिनायकवादिता आदि का आए दिन हौआ खड़ा किए रहते हैं, घोर आश्चर्य है कि वे चीन की साम्राज्यवादी, विस्तारवादी आक्रामक एवं तानाशाही रवैय्ये पर एक शब्द भी नहीं बोलते! उन्हें यूरोप-अमेरिका का पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, बाजारवाद, उपभोक्तावाद तो दिखाई देता है, पर विश्व भर के बाज़ार-व्यापार पर कब्ज़ा करने को उद्धत-आतुर साम्राज्यवादी चीन का नहीं! चीन पर उनकी अंतहीन और भयावह चुप्पी क्या अंदरखाने में किसी गोपनीय सांठगांठ की कहानी नहीं बयां करतीं? मत भूलिए कि यह वही दल है जिसने 62 के युद्ध में भी चीन का समर्थन किया था और अपने इस धृष्ट-दुष्ट आचरण के लिए उसने कभी देशवासियों से क्षमा-याचना भी नहीं की|
अब बात देश की मुख्य विपक्षी पार्टी काँग्रेस की| सच तो यह है कि आज वैचारिक स्तर पर भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी काँग्रेस का अपना कोई मौलिक व ठोस वैचारिक आधार बचा ही नहीं है| गाँधी के ठीक बाद से ही उनका वैचारिक क्षरण होने लगा था| नेहरू स्वप्नजीवी रहे और उनके बाद तो धीरे-धीरे काँग्रेस वामपंथ एवं क्षद्म धर्मनिरपेक्षता का मिश्रित घोल बनकर रह गया| काँग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने तो देश को हर मुद्दे पर लगभग पूरी तरह निराश ही किया है| परिवारवाद की वंशबेल पर खिले 'युवा पुष्प' ने कभी अपने सौरभ-सौंदर्य-सरोकार से देश का ध्यान आकर्षित नहीं किया| उनके किसी विचार से उनकी ताज़गी का एहसास नहीं होता| बल्कि चीन या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे गंभीर मुद्दे पर उनका बचकाना बयान उनकी बची-खुची साख़ में भी बट्टा लगाता है|
ऐसे में सत्तारूढ़ दल व उसके नेतृत्व से अपेक्षाएँ और बढ़ जाती हैं| प्रधानमंत्री मोदी पर देश अब भी अटूट विश्वास करता है| देशवासियों को भरोसा है कि प्रधानमंत्री देश की अखंडता एवं संप्रभुता पर आँच नहीं आने देंगें| वे देश की आन-बान-स्वाभिमान की हर हाल में रक्षा करेंगें| वे देश के आर्थिक एवं व्यापारिक हितों को वरीयता देंगें| इस भरोसे को क़ायम रखना उनकी नैतिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है| उन्हें नीति एवं निर्णयों के स्तर पर सजग और सतर्क रहना पड़ेगा| चीन की धमकी एवं दादागिरी से बेफ़िक्र रहते हुए भारत-चीन सीमावर्त्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को मज़बूती प्रदान करने के बहुप्रतीक्षित कार्य को समयबद्ध चरणों में संपन्न करना होगा| साम्राज्यवादी एवं कुटिल चीन को समझने में जो भूल पंडित नेहरू ने की थी, वैसी ही भूल दुहराना या उस पर भरोसा करना देश को नए-नए संकटों में डालना होगा|
सबसे महत्त्वपूर्ण और स्मरणीय बात यह है कि केवल सरकार और राजनीतिक नेतृत्व के भरोसे किसी भी राष्ट्र का गौरव और स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रखा जा सकता अपितु इसके लिए नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदयित्वों का सम्यक निर्वाह करना पड़ता है| निहित स्वार्थों की तिलांजलि देकर राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी पड़ती है| अपितु स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र की राह में सरकार से बड़ी भूमिका सजग-सतर्क-सन्नद्ध नागरिकों की ही होती है| सरकारें संधियों-समझौतों से बँधी होती हैं, जनसाधारण नहीं| स्वदेशी वस्तुओं का व्यापक पैमाने पर उपयोग-उत्पादन कर चीन की आर्थिक रीढ़ तोड़ी जा सकती है| रोज़गार के नए-नए अवसर तलाशे जा सकते हैं| हर हाथ को काम और हर पेट को भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है| परमुखापेक्षिता के स्थान पर स्वावलंबिता का सामूहिक अभियान समय की माँग है|
✍️प्रणय कुमारगोटन, राजस्थान9588225950pranay.knp@gmail.com
उठ रहा है कांग्रेसी षड्यंत्रों से पर्दा
कोरोना को लेकर शुरू किए गए PM केयर्स फण्ड पर प्रश्न उठाने वाली कांग्रेस अब खुद अपने कार्यकाल में PM राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिए दान को लेकर घिरती नज़र आ रही है।
'पीएम केयर्स' फंड में एकत्रित हुई राशि को 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' में स्थानांतरित कर 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' मे 3800 करोड़ बकाया राशि का उपयोग राहत कार्यों में किया जाना चाहिए: कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी pic.twitter.com/QLcXizl3Sk
— Congress (@INCIndia) April 8, 2020
2005 में दुनिया के कुख्यात पूर्व केजीबी जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब से यह उजागर हुआ था कि इंदिरा सहित कांग्रेस के 40% सांसदों को केजीबी से सूटकेस भरकर पैसे मिलते थे। मनमोहन सिंह के शासन काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन के दूतावास, चीनी सरकार से पैसे मिले थे। इसकी पुष्टि फाऊंडेशन की वार्षिक रिपोर्ट से हुई है।
केजीबी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार के लिये इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर रुपए भेजे। नेहरू के चहेते उनकी कैबिनेट में रक्षा मंत्री वीके कृष्णमेनन के चुनाव के लिये केजीबी ने पैसा दिया था और 1970 में चार अन्य मंत्रियों को अलग से धन मुहैया कराया।https://t.co/U62pZqqg9v
— ऑपइंडिया (@OpIndia_in) March 31, 2019
2011 में आतंकियों से कनेक्शन के आरोपी भगोड़े ज़ाकिर नाईक ने भी राजीव गांधी फाऊंडेशन को 50 लाख रुपये का "दान" दिया था।
पंजाब नेशनल बैंक में हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले के अभियुक्त एवं भगोड़े मेहुल चोकसी ने भी 2014-15 में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाले इस फाउंडेशन में अघोषित "दान" किया था।
#Exclusive #Breaking | Mehul Choksi too ‘funded’ Rajiv Gandhi Foundation. pic.twitter.com/hoZgPH2q9B
— TIMES NOW (@TimesNow) June 26, 2020
प्रधानमंत्री राहतकोष सहित भारत सरकार के 7 बड़े मंत्रालयों एवं 11 बड़े सार्वजनिक उपक्रमों से भी राजीव गाँधी फाऊंडेशन को पैसा दिया गया था।
वितमंत्री रहते हुए मनमोहनसिंह ने भी केन्द्रीय बजट में से विदेशी सोनिया के स्वामित्व वाले राजीव गांधी फाऊंडेशन को धन आवंटन करने की मांग रखी थी।
अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस ड्रैगन/पाकिस्तान सहित हर षड्यंत्रकारी को क्यों अपनी लगते हैं, अब तो समझ आ जाना चाहिए।
✍️गंगा सिंह राजपुरोहित
पाक/चीन समर्थक कांग्रेस
कांग्रेस में चीन और पाकिस्तान समर्थकों की लम्बी सूची हैं। मणिशंकर अय्यर, कपिल सिब्बल, दिग्विजय,सिद्धू की सूची में कारगिल के कांग्रेसी जाकिर हुसैन ने भी अपना नाम लिखा लिया है!
गलवन के शहीदों का मजाक उड़ाकर जाकिर हुसैन ने संदिग्ध/विदेशी सोनिया और राहुल की संदिग्ध नीतियों का ही समर्थन किया है। हालांकि कांग्रेसी पार्षद जाकिर हुसैन के खिलाफ लद्दाख पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और कांग्रेस ने भी खुद को इस मामले से अलग दिखाने का ढोंग करते हुए जाकिर हुसैन को संगठन से निष्कासित कर दिया है।विदित रहे जाकिर हुसैन केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से हैं। वह लद्दाख स्वायत्ता पर्वतीय विकास परिषद कारगिल से पार्षद है। गलवान घाटी में सोमवार रात भारतीय जांबाजों की शहादत पर जाकिर हुसैन अपने एक दोस्त निसार से टेलीफोन पर भारत और देश के वीर जवानों के खिलाफ जहर उगलते हुए, मोदी के प्रति घृणित टिप्पणी व चीन की प्रशंसा करते हुए नजर आ रहा है। इस ऑडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर विरोध को देखते हुए कारगिल स्वायत्त विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष फिरोज खान ने जाकिर हुसैन को पार्टी से निष्कासित कर दिया है एवं पुलिस के डर से जाकिर ने भी अपने आपको भूमिगत कर लिया है!
भले ही कांग्रेस आज जाकिर को पार्टी से निष्कासित करने का ढोंग कर रही हो, कल सिब्बल, सिंघवी जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी अन्य इस्लामिक आतंकियों की तरह जाकिर हुसैन की भी ढाल अवश्य बनेंगे!
~गंगा सिंह
"अंतरराष्ट्रीय योग दिवस"
"अंतरराष्ट्रीय योग दिवस"
21 जून वर्ष का सबसे लम्बा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। भारतीय परंपरानुसार ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन को जाता है। यह समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में लाभकारी होता है इसलिए पहली बार यह दिवस 2015 से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया गया था जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी।
11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 177 सदस्यों द्वारा मोदी/भारत द्वारा रखे प्रस्ताव को मंजूरी मिली. भारत के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो अब तक का संयुक्त राष्ट्र संघ में सबसे कम समय में पास होने वाला प्रस्ताव है।
योग भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष पुरानी विरासत है,जिसके प्रणेता महर्षि पतंजलि को माना जाता है. योग साधना में जीवन शैली का पूर्ण सार समाहित किया गया है।
21 जून 2015 को नई दिल्ली में पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 35 मिनट तक 21 योग आसन का प्रदर्शन किया था। योग दिवस दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा मनाया गया था। राजपथ पर हुए समारोह ने दो गिनीज रिकॉर्ड्स की स्थापना की सबसे बड़ी योग क्लास 35,985 लोगों के साथ और 44 देशों के लोगों द्वारा इस आयोजन में एक साथ भाग लेने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया था।
इस साल कोरोना महामारी के कारण अंतरराष्ट्रीय योग दिवस सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जाएगा। मन और चित को स्वस्थ रखने के लिए संपूर्ण दुनिया के साथ इस बार हम सबको इसे अपने घर पर रहकर ही मनाना है।लेखक
गंगासिंह
चीन से आक्रोशित विश्व समुदाय
चीन से आक्रोशित विश्व समुदाय
चीन की विस्तार वादी नीतियों से परेशान पूरा वैश्विक समुदाय अपने अपने स्तर पर चीन को घेरने का प्रयास कर रहा हैं।
पूर्वी लद्दाख में चीन द्वारा भारत के पीठ में छुरा घोंपने के षड्यंत्र का समुचित प्रत्युत्तर देने के लिए भारत द्वारा भी सैन्य व कूटनीतिक विकल्पों के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।
चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने के लिए व्यापक योजनाऐं बनाई जा रही है। इसके तहत चीन से होने वाले व्यापार,निवेश और प्रोजेक्ट सर्विसेस पर भी लगाम लगाने की तैयारी की जा रही है। सरकारी ठेकों और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की परियोनाओं में चीन की कंपनियों के भाग लेने पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जा रहा है।
चीन से आने वाले तैयार माल पर भारी टैक्स लगाऐ जा रहे है। इसके साथ ही विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की भी समीक्षा की जा रही है,चीन से आयात कम करने के लिए भारत के पास उपलब्ध विकल्पों में से एक हाई टैरिफ/नॉन-टैरिफ उपायों पर भी विचार हो रहा हैं।
भारत के मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में चीन की कंपनियों की बड़ी हिस्सेदारी पर रोक लगाने के लिए भारतीय जन समुदाय, स्वयं सेवी संगठन, औद्योगिक संगठन भी पूरी तरह से उद्वेलित है तो दूसरी तरफ सरकार चीन द्वारा निर्मित सामान पर सख्त क्वालिटी स्टेण्डर्ड नियम लागू करने व घरेलू कंपनियों को भी प्रोत्साहन देने वाली नीतियों पर विचार कर रही है।
हमेशा शांत रहने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सोशल मीडिया पर "चीन और चीनी उत्पादों का बहिष्कार" का अभियान चलाकर भारत सरकार को चीन के सम्पूर्ण बहिष्कार का आव्हान कर रहे हैं!
लेखक
गंगा सिंह
महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के बरक्स सच्चे नायकों की पहचान....
महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के बरक्स सच्चे नायकों की पहचान....
एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन-चरित्र तो दूसरी ओर आज के कथित कुल ड्यूड किशोर-किशोरियों का शीत-घाम-वर्षा से मुरझा-मरझा जाने वाला छुई-मुई सरीखा जीवन! कितना आश्चर्य है लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना के देश में ''क्या अदा, क्या जलवे तेरे'' जैसे गीतों और मुहावरों पर मुग्ध होकर रीझ-रीझ उठने वाली पीढ़ियाँ बहुतायत में पाई जाती हैं| कई बार तो लगता है कि आज पूरा देश ही पारो और देवदास हुआ जा रहा है| जो आयु संघर्षों-संस्कारों की आग में तपकर कुंदन बनने की होती है, उस आयु में आज की पीढ़ी तमाम आकर्षणों एवं सुविधाओं में फँसकर लक्ष्य-च्युत जीवन जीने को अभिशप्त होती है| प्रसाधन-उद्योग ने पूरे देश को सौंदर्य-प्रतियोगिताओं का बाज़ार-सा बना दिया है|माँ-बहन-बेटियाँ-बहू जैसे संबोधन बाज़ार के लिए बेमानी हो गए हैं; बाज़ार ने स्त्रियों को केवल उत्पादों को परोसने वाले उपकरण की तरह प्रस्तुत किया है| महिला सशक्तीकरण के झंडाबरदारों ने बराबरी की प्रतिस्पर्द्धा कर स्वयं को भोग्या ही बनाया है|
कला व आधुनिकता के नाम पर निर्लज्ज खुलेपन व अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है| इन कथित कलाकारों की दृष्टि में 'शीला' जवान हो रही हैं तो 'मुन्नी' बदनाम; और घोर आश्चर्य है कि ऐसी जवानी व बदनामी पर ''वीर जवानों'' का यह तरुण ''देश'' लट्टू हुआ जा रहा है| वीरता व धीरता के स्थान पर ऐन्द्रिक कामुकता, सुविधावादिता या भीरुता हमारी पहचान बनती जा रही है| त्याग-तपस्या के स्थान पर भोगवाद की आँधी चल रही हैं| चौकों-छक्कों या ठुमकों-झुमकों पर मुग्ध पीढ़ी नकली सितारों में नायकत्व ढूँढ़ रही है| जबकि उन्हें वीरांगना लक्ष्मीबाई जैसे उज्ज्वल और धवल चरित्रों में वास्तविक नायकत्व की छवि देखनी चाहिए और बचपन से ही उनके आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए|
ज़रा कल्पना कीजिए, दोनों हाथों में तलवार, पीठ पर बच्चा, मुँह में घोड़े की लगाम; हजारों सैनिकों की सशस्त्र-सन्नद्ध पंक्तियों को चीरती हुई एक वीरांगना अंग्रेजों के चार-चार जनरलों के छक्के छुड़ाते हुए तीर की तरह निकल जाती हैं, और अंग्रेज भौंचक्क देखते रह जाते हैं; क्या शौर्य और पराक्रम का इससे गौरवशाली और दिव्य चित्र कोई महान चित्रकार भी साकार कर सकता है? जो सचमुच वीर और पराक्रमी होते हैं वे अपना लहू देकर भी अतीत, वर्तमान और भविष्य का स्वर्णिम चित्र गढ़ते हैं| महारानी लक्ष्मीबाई, महारानी पद्मावती, महारानी दुर्गावती ऐसी ही दिव्य-दैदीप्यमान-उज्ज्वल चरित्र थीं| विश्व-इतिहास में महारानी लक्ष्मीबाई जैसा चरित्र ढूँढे नहीं मिलता, यदि उन्हें विश्वासघात न मिलता तो इतिहास के पृष्ठों में उनका उल्लेख किन्हीं और ही अर्थों व संदर्भों में होता | नमन है उस वीरांगना को जिनके स्मरण मात्र से नस-नस में विद्युत-तरंगें दौड़ जाती हैं....काश...काश कि इस देश की ललनाएँ लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं से प्रेरित-पोषित होतीं...! काश कि इस देश के नौजवान ऐसे चरित्रों से सीख लेकर वैसा ही तेजस्वी, पराक्रमी, साहसी जीवन जीने का संकल्प धारण करते!
आज वीरांगना लक्ष्मीबाई का बलिदान-दिवस है| यह भारत-भूमि वीर-प्रसूता है| यहाँ बलिदान की गौरवशाली परंपरा रही है| हमें देश के लिए जीना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो मातृभूमि पर त्याग और बलिदान हेतु भी सदैव तत्पर रहना चाहिए| इसी में तरुणाई है, इसी में यौवन का असली शृंगार है, इसी में कुल-गोत्र-परिवार का मान व गौरव है| राष्ट्र-देव पर ताजे-टटके पुष्प ही चढ़ाए जाते हैं, बासी-मुरझाए पुष्प तो राह की धूल में पड़े अपने भाग्य को तरसते-कोसते रहते हैं|
लेखक
प्रणय कुमारगोटन, राजस्थान9588225950
कृष्ण है...
कृष्ण है...
नवरस में शृंगार कृष्ण है।
ऋतु मधु की मनुहार कृष्ण है।
होंठों पर मुस्कान मनोहर,
आंखों में अंगार कृष्ण है।
मोर मुकुट पीताम्बर साजे,
वैजयंती गल हार कृष्ण है।
मर्यादामय राम सदा ही,
लीलामय अवतार कृष्ण है।
षोडश कला, ज्ञान, नीति के,
उत्तम नर साकार कृष्ण है।
छन्दों में है छंद अनुष्टुप,
औ' उपमालंकार कृष्ण है।
मधुराधर, गीता के गायक,
जगती के आधार कृष्ण है।
ब्रजमंडल में सभी नारियां,
नर वह एक हमार कृष्ण है।
एक रूप राधा संग नाचे,
गोपी संग हजार कृष्ण हैं।
धेनु संग विचरे नंदलाला,
बन उपवन उपहार कृष्ण है।
पेड़ों में पीपल प्रमोदमय,
हरिप्रिय हरसिंगार कृष्ण है।
रचनाकार
प्रमोद श्रीमाली
पूज्य बालासाहेब देवरस को विनम्र श्रद्धांजलि
"पूज्य बालासाहेब देवरस को विनम्र श्रद्धांजलि"
![]() |
| स्व. श्री बाला साहेब देवरस |
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है!
सुख-साधन-सत्ता-प्रसिद्धि के शिखर पर आरूढ़ व्यक्ति भी जब आत्महत्या जैसे पलायनवादी विकल्पों का चयन करते हैं तो मेरा मन क्षुब्ध हो उठता है; क्षुब्ध हो उठता है मेरा मन जब मैं पाता हूँ कि जीवन रूपी वरदान पर मार-तमाम लोग एक छोटी-सी हार, एक अतृप्त अभिलाषा, एक असफलता, कुछ अनियंत्रित-अदम्य महत्त्वाकांक्षा या किसी कथित उपेक्षा-अपमान को अधिक वरीयता देते हैं| जब मैं अखबारों के पन्नों में आत्महत्या जैसी खबरों को सुर्खियाँ बटोरते पाता हूँ, तब बहुत क्षोभ होता है| तब बहुत क्षोभ होता है, जब मैं पाता हूँ कि आईआईटी-आईआईएम जैसे उच्च संस्थानों में पढ़ने वाले या पढ़कर निकले छात्र आत्महत्या जैसे अतिवादी, कायरतापूर्ण विकल्प का चयन करते हैं| क्या हमारी शिक्षा उनमें इतना भी आत्मविश्वास नहीं पैदा कर पाती कि वे जीवन के उतार-चढ़ाव का साहस और धैय के साथ सामना कर सकें?
मेरा मानना है कि आत्महत्या हत्या से भी अधिक कुत्सित और घृणित कृत्य है, क्योंकि हत्या के पीछे निहित स्वार्थ या प्रतिशोध की दुर्भावना काम कर रही होती है, पर यहाँ तो केवल कायरता और पलायनवादिता के अतिरिक्त और कोई ठोस कारण नहीं होता| हत्या की यंत्रणा जितनी गहरी होती है, आत्महत्या की यंत्रणा उससे भी गहरी होती है, आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपने घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को अनगिनत सवालों से जूझने के लिए अकेला छोड़ जाता है, हर आँख उसे संदेह के घेरे में ले रही होती है| इच्छामृत्यु की विवशता और आत्महत्या में बहुत फ़र्क होता है| मुझे तो कई बार यह लगता है कि आत्महत्या करने वाले युवा-स्वस्थ लोग सहानुभूति नहीं उपेक्षा के पात्र अधिक हैं, चाहे उन्होंने कैसी भी मज़बूरी में ऐसा निर्णय क्यों न लिया हो? कोई भी मज़बूरी मनुष्य के मनोबल से बड़ी नहीं हो सकती! कायर और भगोड़े लोग आत्महत्या करते हैं और समाज को भी पलायन का पाठ पढा जाते हैं| सफलता के उतावलेपन में ही ऐसे निर्णय लिए जाते हैं| इतिहास ऐसे आत्महंताओं को योद्धा की भाँति याद नहीं करता! कोई भी मज़बूरी, कोई भी समस्या, कोई भी चुनौती इतनी बड़ी नहीं कि उससे पार नहीं पाया जा सके|
आप किस सपने के टूटने की बात करते हैं? क्या आपका सपना आपके माता-पिता, घर-परिवार से बड़ा है? आपने तो उन्हें जीते-जी मार दिया? वे आपको याद करते-करते स्वयं को दंड देने लगते हैं, सभी को शक-संदेह से देखने लगते हैं, जीवन से उनका मोहभंग हो जाता है!लोगों पर से उनका सहज विश्वास ही उठ जाता है|आपसे बढ़कर उनके लिए कोई और सपना नहीं था, आप ही उनके सपनों के जीवित-जाग्रत स्वरूप थे, आपने तो एक नहीं अनेक सपनों का गला घोंट दिया!क्या हुआ कि आपका आईआईटी, मेडिकल, मैनेजमेंट कोर्सेज़ में चयन नहीं हुआ; क्या हुआ कि आपने अच्छा स्कोर नहीं किया; क्या हुआ कि आपने जीवन से जो चाहा था,वैसा नहीं मिला; क्या हुआ कि आपको कोई भी समझ नहीं पाया; क्या हुआ कि आपको दुनिया ने बहुत प्रताड़ित-कलंकित किया; क्या हुआ कि आप बहुत ऊँचे जाकर फिर नीचे गिरे, क्या हुआ कि आप शिखर पर लंबे वक्त तक टिके न रह सके- ये सभी कारण बहुत छोटे हैं, बहाने हैं, बक़वास हैं| जीवन ऐसे असंख्य कारणों से बड़ा है| याद रहे, जीवन का ध्येय केवल जीवन है! जी हाँ, केवल जीवन!! क्या आपकी तकलीफ़ और मुफ़लिसी उन मजदूरों से भी बड़ी थी, जिन्होंने अपने पाँवों और इरादों से मीलों का सफ़र दिनों में तय कर लिया|
मानिए कि आपमें हिम्मत की कमी थी; कि आपमें साहस नहीं था; कि ज़िन्दगी ने जब आपको साहस दिखाने का मौका दिया, ठीक उसी वक्त आप ज़िन्दगी से भाग खड़े हुए; क्या आप पहले व्यक्ति थे जिसने इस प्रकार का तनाव और अवसाद झेला; क्या आप पहले व्यक्ति थे, प्रतिकूलताएँ कदम-कदम पर जिनका रास्ता रोके खड़ी रहीं? झूठे हैं आप, दुनिया की आँखों में धूल झोंक रहे हैं आप, याद रखिए कि दुनिया की आँखों में धूल झोंकना तो बहुत आसान है, पर अपनी आँखों में, शायद असंभव! सच तो यह है कि कायर हैं आप; स्वीकारिए कि आपमें हौसले की कमी है! आपको सोचना चाहिए कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी और अधिक क्यों न हो, आपका होना मात्र समस्याओं से कहीं अधिक बड़ा और आशय भरा है|
याद रखें, बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्ज़ा करती हैं| शिवाजी ने बहुत छोटी आयु में ही अभेद्य किलों और दुर्गों पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसका एकमात्र कारण यह था कि उनका बचपन संघर्षों और अभावों में बीता था; पिता की छाँह से दूर वे जीवन की तपती धूप में पले-बढ़े थे; प्रताप ने भारत की आन-बान-शान की रक्षा की, अपने शौर्य एवं पराक्रम से वीरता का एक नया अध्याय रचा, क्योंकि उन्होंने महलों का ऐशो-आराम छोड़ बीहड़ों और जंगलों के ख़ाक छानना स्वीकार किया, अपने फूल से बच्चों को भूख से बिलबिलाते और तड़पते देखा; महाभारत में देश के प्रायः अधिकांश वीर कौरवों के पक्ष में थे, फिर भी जीत पांडवों की हुई, क्योंकि उन्होने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के ज़ोखिम को पार किया था; ऐसा कौन है इस जगत में जो संघर्षों की आग में तपे-जले बिना चमका-दमका हो, है कोई..?
महाकवि दिनकर ने कहा था कि ''ज़िन्दगी की दो सूरते हैं! एक तो यह कि आदमी बड़े-से-बड़े मक़सद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए, और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अंधियारे का जाल बुन रही हों, तो भी वह पीछे को पाँव न हटाए|
दूसरी सूरत यह है कि उन बेबस, लाचार, ग़रीब आत्माओं की हमजोली बन जाए जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुःख पाने का ही संयोग है, क्योंकि ऐसी आत्माएँ उस दुनिया में बसती हैं, जहाँ न तो जीत हँसती है, और न कभी हार के रोने की आवाज़ ही सुनाई देती है| ऐसी दुनिया के लोग बँधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे ज़िन्दगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते! और कौन कहता है कि पूरी ज़िंदगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनन्द नहीं है! अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है|"
जिसने चरैवेति-चरैवेति का मर्म जान लिया, उसने जीना सीख लिया|
साहस सभी गुणों का वाहक है| साहस की ज़िंदगी सबसे बड़ी ज़िन्दगी होती है| ऐसी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि यह बिलकुल निडर, बिलकुल बेख़ौफ़ होती है| दिनकर के ही शब्दों में ''साहसी मनुष्य इस बात की चिंता बिलकुल नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोचते और क्या कहते हैं!जनमत की उपेक्षा करके चलने वाले लोग दुनिया की असली ताक़त हुआ करते हैं, मनुष्यता को प्रकाश भी ऐसे ही लोगों से मिल पाता है| झुंड में चरना और झुंड में चलना भेड़-बकरियों का काम है, सिंह तो अकेला भी मग्न रहता है|'' यदि आप अड़ोस-पड़ोस की टिप्पणियों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं तो आपमें साहस की कमी है| साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है, जिसे दुनिया पागलपन समझती है|साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता, वह तो अपनी धुनों में रमा हुआ अपनी ही कहानी गढ़ता है, अपनी ही किताब पढ़ता है|
सच तो यह है कि ज़िन्दगी से, अंत में, हम उतना ही पाते हैं जितनी कि उसमें पूँजी लगाते हैं और यह पूँजी लगाना बड़े संकटों का सामना करना है, उसके उस पन्ने को उलट-पलटकर पढ़ना है, जिसके सभी अक्षर फूलों से ही नहीं कुछ अंगारों से भी लिखे गए हैं| अंगारों से लिखे गए पृष्ठों को छोड़ जो भाग खड़ा होता है, ज़िन्दगी भी उसे छिटक आगे बढ़ जाती है|ज़िन्दगी को उसी ने समझा है जो यह मानकर चलता है कि ज़िन्दगी कभी भी न ख़त्म होने वाली चीज़ है| जो यह मानकर चलता है कि 'यह भी बीत जाएगा| जो यह मानकर चलता है कि इस अनिश्चित संसार में कुछ भी निश्चित नहीं! आज दुःख है तो कल सुख भी होगा, हर स्याह-अँधेरे रात की भी सुबह होती है| इसलिए कभी भी, कैसी भी स्थिति-परिस्थिति में निराश-हताश होकर स्वयं को चोट पहुँचाना मूर्खता है|ज़िन्दगी को ठीक से जीना हमेशा ही ज़ोखिम झेलना है|जो ज़ोखिम से बचकर सुविधाओं के पीछे दौड़ते-भागते रहते हैं, वे अंततः उसी में कैद होकर मर जाते हैं|
महाकवि दिनकर के शब्दों में:-यह अरण्य झुरमुट जो काटे अपनी राह बना लेक्रीतदास यह नहीं किसी का जो चाहे अपना लेजीवन उनका नहीं युधिष्ठिर जो उससे डरते हैंवह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं|
इसलिए जो मिला है, उसे धन्यवाद-भाव से स्वीकार कीजिए| वह आपके ही फ़ैसलों का परिणाम है| वह आपके ही ज्ञात-अज्ञात कर्मों का फल है| यदि नहीं भी है तो द्रष्टा-भाव से स्वीकार करें|मनुज रूप में अवतार लेने वाले अवतारी पुरुषों को भी जीवन के कष्टों-तापों से गुज़रकर ही पूर्णता मिली है, उनके सामने हमारा-आपका अस्तित्व तो नगण्य ही है न!महाकाल देवता सपासप कोड़े बरसा रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनकी चेतना उर्ध्वगामी है, जो अपने भीतर से जीवन-रस खींच खड़े हैं, डटे हैं, जूझ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी मज़बूत है-वे बचे रहेंगे| जीवन का अपमान अस्तित्व का अपमान है|
जब किसी सपने के टूटने का एहसास दिल-दिमाग पर हताशा, दुःख और अवसाद बनकर गहराने लगे तो 'नीरज' की ये पंक्तियाँ दुहराएँ-गुनगुनाएँ:-
लाखों बार गगरियाँ फूटीं,शिकन न आई पनघट पर,लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,चहल-पहल वो ही है तट पर,तम की उमर बढ़ाने वालोंलौ की आयु घटाने वालोंलाख करे पतझड़ कोशिशपर उपवन नहीं मरा करता हैकुछ सपनों के मर जाने सेजीवन नहीं मरा करता हैजीवन नहीं मरा करता है…!!
लेखकप्रणय कुमार,गोटन, राजस्थान9588225950
दूसरी सूरत यह है कि उन बेबस, लाचार, ग़रीब आत्माओं की हमजोली बन जाए जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुःख पाने का ही संयोग है, क्योंकि ऐसी आत्माएँ उस दुनिया में बसती हैं, जहाँ न तो जीत हँसती है, और न कभी हार के रोने की आवाज़ ही सुनाई देती है| ऐसी दुनिया के लोग बँधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे ज़िन्दगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते! और कौन कहता है कि पूरी ज़िंदगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनन्द नहीं है! अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है|"
राजनीति के एक युग का पुनरावलोकन
बिहार की राजनीति के सबसे चर्चित शख्सियत श्री लालू प्रसाद यादव का कल जन्मदिवस था| स्वाभाविक है कि उनके समर्थक से लेकर विरोधी तक ने कल उनके समर्थन या विरोध में अपने-अपने विचार प्रकट किए| आज भले लालू का तिलिस्म टूट रहा हो, पर एक दौर में उनका जादू लोगों के सर चढ़कर बोलता था| जहाँ अपने समर्थकों के लिए वे सामाजिक न्याय के अग्रदूत और गरीबों के मसीहा थे वहीं विरोधियों के लिए वे राजनीति के कलंक और अंधकार युग के जनक और प्रवर्त्तक रहे| एक साथ इतना धुर समर्थन और इतना धुर विरोध शायद ही किसी अन्य राजनीतिज्ञ को झेलना पड़ा हो|
जो बिहार कभी अपनी समृद्ध विरासत, गौरवशाली अतीत और वर्तमान बौद्धिकता के अग्रदूत के रूप में जाना जाता रहा, उसे लालू ने अपने अलहदा अंदाज़, अनगढ़ मुहावरे और नित नवीन मसखरेबाजी से न केवल भिन्न व विशेष पहचान दिलाई बल्कि संपूर्ण देश में 'बिहारियों' को भी इस नई पहचान का पर्याय बना डाला| 'बिहारी' होना धीरे-धीरे शर्म और मज़ाक का विषय बन गया| इस संबोधन को कई लोग गालियों की तरह इस्तेमाल करने लगे तो कई लोग आनन-फानन में दिल्ली-हरियाणा शैली की हिंदी बोल अपनी 'बिहारी' पहचान को छुपाने की असफल चेष्टा करने लगे| कामकाजी दुनिया में 'बिहारी' लोगों को कभी सीधे 'लालू' बोलकर तो कभी उन जैसी हिंदी बोलकर चिढ़ाया जाने लगा| जो लोग ऐसा करते रहे, उनकी मानसिकता की पड़ताल फिर कभी, किंतु आज यह जानना आवश्यक है कि लालू-राज के परोक्ष एवं सहायक परिणाम क्या-क्या हुए, उसका सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव कैसा रहा?
बिहार अपनी बौद्धिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता एवं सजगता के लिए जाना जाता रहा है| परंतु यह वह दौर था, जब जातीय घृणा की फसल को भरपूर बोया गया, खाद-पानी देकर बड़ा किया गया और उसे बार-बार काटा गया; यह वह दौर था, जब विकास का पहिया प्रतिगामी गति से घुमाया गया| मुझे अच्छी तरह याद है कि तब लोग सूर्य अस्त होते ही अपने-अपने घरों में दुबककर बैठे रहना पसंद करते थे, अंधेरा होते-होते दुकानों के शटर गिरने लगते थे, थोड़ी भी देर होने पर परिजनों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंचने लगती थीं, अपहरण कुटीर उद्योगों की तरह बिहार के शहर-शहर, गली-गली में विस्तार पाने लगा था, जब स्टेशनों, बस अड्डों, चौक-चौराहों, घरों-दफ़्तरों-दुकानों में देश-दुनिया की चर्चा की बजाय किसी-न-किसी उभरते रंगबाज़, गैंगस्टर, क्रिमिनल की चर्चा होने लगी थी और सबसे ख़तरनाक स्थिति यह थी कि बड़े होते बच्चे किसी सुंदर-स्वस्थ सपनों को सँजोने की बजाय एक रंगबाज़, गैंगस्टर या अपराधी बनने का सपना पालने लगे थे| किसी समाज के पतन की यह पराकाष्ठा होती है कि वह अपराधियों में नायकत्व की छवि तलाशने लगे| उस दौर में सभी जातियों के अपने-अपने अपराधी-नायक थे, समाज उन अपराधियों के पीछे बँटता और लामबंद होता चला जा रहा था| लोगों को लालू यादव में भी एक नेता की कम, एक दबंग जातीय सरगना की छवि अधिक दीखने लगी थी| नतीज़तन नेता और अपराधी का भेद मिटने लगा था|
संस्थाओं का जातीयकरण होता गया और उन जातीय दबंगों ने भ्र्ष्टाचार को एक संस्कृति बना दी| भिन्न जाति वालों से वसूली को सामाजिक न्याय का ज़ामा पहनाया जाता रहा| कोढ़ में खाज का काम इस वामपंथी नैरेटिव ने किया कि जिनके पास पैसा और ज़मीन है वे लूटे-ख़सूटे जाने लायक ही हैं| भ्र्ष्टाचार का संस्थानीकरण होता गया| भ्र्ष्टाचार एक नियामक और मान्य सत्ता बनती गई और गरीबों के मसीहा व उनके जातीय अनुयायी एक उदीयमान शोषक सत्ता के रूप में स्थापित होते चले गए| जिसका परिणाम यह हुआ कि उद्योग-धंधे बंद होते चले गए, बड़े व्यापारी राज्य छोड़कर अन्यत्र चले गए, प्रतिभाशाली युवा पलायन कर गए और कालांतर में जो बचे वे या तो छोटे-मंझोले कृषक रहे या मजदूर बन गए| और एक दिन ऐसा आया कि यादवों को छोड़कर बिहार की सभी जातियों का उनसे मोहभंग होता चला गया|
अचरज नहीं कि जैसे हर युग का अवसान होता है, सो लालू-युग का भी अवसान हुआ| काठ की हांडी जैसे बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती वैसे जातिवाद की राजनीति भी हमेशा सत्ता नहीं दिलाती| लालू जी को अपदस्थ कर नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी, जिसके पहले कार्य-काल में कुछ अच्छे काम भी हुए, उम्मीद जगी, उन पर विश्वास भी बढ़ता गया| परंतु उनका वर्तमान कार्य-काल अत्यंत निराशाजनक रहा है| शासन-प्रशासन की शैली और कार्यसंस्कृति में कोई ख़ास बदलाव नहीं आ पाया है| भ्र्ष्टाचार और जातिवाद बिहार को पहले भी दीमक की तरह खोखला करता रहा और आज भी कर रहा है| बिहार एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक सुधार की अपेक्षा रखता है| सत्ता या व्यक्ति बदलने से बिहार का भविष्य बदलता नहीं दिखाई दे रहा| बिहार को यदि अपना भाग्य बदलना है तो उसे एक दूरदर्शी राजनीतिक नेतृत्व तलाशना होगा| जातिमुक्त, स्वस्थ, उदार, सहयोगी समाज की रचना करनी होगी| शिक्षा-व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन और निवेश करने होंगें| पलायन आधारित अर्थरचना की बजाय आत्मनिर्भर और स्वावलंबी व्यवस्था खड़ी करनी होगी| बिहार का लालू-कालीन अतीत अंधकारमय रहा है वर्तमान शिथिल व गतिशून्य तो भविष्य अनिश्चित| परंतु बिहार सदा से नवीन राहों का अन्वेषी है| घटाटोप अँधेरों के बीच भी इसने आलोक-पथ पर सधे चरण बढ़ाए हैं| देखना दिलचस्प होगा कि वह भविष्य का वाहक किसे और क्यों चुनता है?
लेखक
प्रणय कुमारगोटन, राजस्थान9588225950
"नेहरू की गलतियों का दंश और राहुल की सियासी नौटंकी"
"नेहरू की गलतियों का दंश और राहुल की सियासी नौटंकी"
देश का विपक्ष शत्रु पक्ष द्वारा फैलाई गई झूठी खबरों पर विश्वास कर देश की जनता को उद्वेलित करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहता।
सामान्य से भी कम समझ रखने वाला राहुल लद्दाख़ में चीनियों द्वारा अवैध कब्जे के नाम पर मोदी सरकार को अस्थिर करने की भरपूर कोशिश कर रहा हैं लेकिन भारतवर्ष का प्रबुद्ध वर्ग अच्छी तरह से जानता है कि वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व देश की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होने देगा।
वैसे देश का प्रबुद्ध वर्ग राहुल/और राहुल को ज्ञान देने वालों से पूछना चाहता हैं कि वह राहुल को यह भी तो बताए कि सिगार के कस खीचने वाला और एडविना के मोहपाश में फंसे नेहरू की अज्ञानता षडयंत्र के कारण चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिली, अमेरिका के विरोध के बावजूद तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने वाला नेहरू ही था, अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि पाने की लालसा में पंचशील समझौते का गीत गाते गाते नेहरू ने 1957 में सिक्यांग- तिब्बत सड़क (अक्साई चीन होते हुए) बनने का चीन को अवसर प्रदान किया, विदित रहे अक्साई चीन भी भारत का ही हिस्सा था!
1962 में चीन ने नेहरू की मूर्खता के कारण भारत की 38000 स्क्वायर किलोमीटर जमीन कब्जे कर ली। इसी तरह 1948 में पाकिस्तान ने भारत की 78000 स्क्वायर किलोमीटर जमीन हथिया ली थी, जिसे वापस लेने का नेहरू पंथियों ने कभी प्रयास ही नहीं किया!
सशस्त्र बलों के 9 सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भी राहुल की इस सियासी नौटंकी की आलोचना की है!
लेखक
गंगा सिंह
"तू मेरा कौन लागे रे"
"तू मेरा कौन लागे रे"
तुझमे ही भगवान देखा
मुझमें जगा इंसान देखा
भरी दुपहरी तपता सूरज
कंठ सूखता जाए रे
तू मेरा कौन लागे रे।मात-पिता प्यारे गुरुजन से
नानी -दादी औरपरिजन से
प्यासे पंथी-पंछी की सेवा के
दिए यही संस्कार रे।
तू मेरा कौन लागे रे।ये मेरा कर्म,न फल की इच्छा
ये मेरी डगर है दिल है सच्चा
ये पानी है करतार खजाना
कोई न प्यासा जाए रे।
तू मेरा कौन लागे रे।न मैं पूछूं जात-धर्म और
ना पूछूं तेरा ठिकाना रे
इस द्वारे पे जो भी आया
प्यास बुझाकर जाए रे।
तू मेरा कौन लागे रे।रचनाकार
"सागर"महेन्द्र थानवी
"जागो फिर एक बार" का सनातनी उद्घोष !
'जागो फिर एक बार' का सनातनी उद्घोष !
भाल-अनल धक-धक कर जला, भस्म हो गया था काल,अभय हो गये थे तुम मृत्युंजय व्योमकेश के समान, अमृत संतान!
सिन्धु-नद के तीर वासियों को व्योमकेश कहती; काल को भी जला दें, ऐसे श्रेष्ठ जनों के उद्गीत करती यह पंक्तियाँ किसकी है? किसने इस भूमि के अमृत-पुत्रों का यश-गान किया?
वे ही निराला, जिन्हें कुछ आलोचक जबरन वामपंथी विचारधारा के लौह-चौकटे में कैद करना चाहते है। वे ही निराला जिनकी कविताओं में थोथा सेक्युलरिज्म खोजने के लिए कभी ‘राम की शक्ति-पूजा’ तो कभी ‘तुलसीदास’ कविता की मनमानी व्याख्या द्वारा ऊंट के गले में बिल्ली बाँधने जैसा कार्य किया जाता है।
किन्तु ये आलोचक इसमें सफल नहीं हो पाते। सिद्ध है कि निराला पर बंकिम चन्द्र और स्वामी विवेकानंद जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का प्रभाव था। शम्भुनाथ अपनी ‘संस्कृति की उत्तरकथा’ में स्वीकारते भी है कि निराला वेदांती थे। तब फिर वेदांत से ओत-प्रोत उनका यह अध्यात्मिक बोध विचारधारा के चौखटों को तोड़-ताड़कर मुक़द्दस उद्वेलन करें तो क्या आश्चर्य?
यही उद्वेलन उनके काव्य की भावभूमि में अध्यात्म-बोध व जातीय -गौरव का मणि-कांचन योग बनकर शाया होता है. विवेच्य कविता ‘जागो फिर एक बार’ भी इसी की एक श्रृंखला है। इस कविता का प्रथामांश यदि पेशलता का प्रतिनिधि है तो द्वितीय अंश सांस्कृतिक चेतना का निकष. इसके माध्यम से निराला पहले मृदुल भाषा द्वारा जाग्रति लाने का यत्न करते है।
देश की सुप्त तरुणाई के समक्ष वे तरह-तरह के उपमान प्रस्तुत करते है. कभी कलियों में ‘मधुर मद-उर यौवन उभार’ आने का संकेत। तो कभी ‘अरुणाचल में रवि’ के उगने की सूचना। कभी ‘प्रकृति पट क्षण-क्षण में परिवर्तित’ होने की आवाज तो कभी ‘तारों के भी थक-हार’ जाने का दुःख. किन्तु अर्जुन बनी इस देश की तरुणाई अलसाई हुई है। हेलुसिनेशन का शिकार है। न तो उसे आत्मचेतना है। और न ही राष्ट्र चेतना। तब फिर वह कैसे जागे?
संभवत इसीलिए महाप्राण को श्रीकृष्ण बनकर पुनः जागरण महानाद करना पडा किन्तु इस बार वे मृदु-पेलव शब्दों में ‘पियु-रव पपिहों’ के साथ ‘सेज सजी विरह विदग्धा वधु’ के बजाय इस देश के संघर्षी अतीत का गान करने वाली ओज-पूर्ण शब्दावली का प्रयोग करते है. वे इस देश की उज्जवल परम्परा जिसे यदि सनातन परम्परा कहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, का गान करते है।वे कहते है-‘सवा-सवा लाख पर एक को चढाऊंगागोविन्द सिंह निज नाम जब कहाऊंगा’
और फिर स्वयं ही पूछते है- “किसने सुनाया यह वीर-जन-मोहन अति दुर्जय संग्राम-राग? किसने देश रक्षार्थ अराति मुगलों से रक्त का फाग खेला था? किसने सुनाया था, उन्हीं दशम गुरु ने, जिन्होंने मुगलों के अत्याचार से सतत संघर्ष करते हुए ‘जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे’ की घोषणा की; जिन्होंने स्वधर्म रक्षार्थ अपने चारों पुत्रों को वार दिया. वे ही गुरु जिन्होंने चंडी-चरित जैसा काव्य सिरजकर शौर्य की पताका महत्त्व रेखांकित करते है।
निराला यहीं तक नहीं रुकते. आगे वे विश्व-वन्दित श्रीमद्भाग्वदगीता का सार एक वाक्य में प्रस्तुत करते है :-‘योग्य जन जीता है पश्चिम की उक्ति नहीं-गीता है गीता है’
कर्म-सन्देश देती; शौर्य का भाव जगाती यह उदघोषणा क्या निराला के सनातन-भाव को प्रस्तुत नहीं करती? क्या इन पंक्तियों में उनका हिंदुत्व नहीं झलकता? यदि नहीं तो आगे की ये पंक्तियाँ कि, ‘महामंत्र ऋषियों का
अणुओं- परमाणुओं में फूंका हुआ-
तुम हो महान, तुम सदा महान हो।
ब्रह्म हो तुम’
क्या संकेत देती है? कौन हैं वे ऋषि जिन्होंने अणुओं- परमाणुओं में महानता का मन्त्र फूंका? किन ऋषियों से निराला स्वयं को जोड़ रहे है? ये अरब- तुर्क- शक- हूण तो कतई नहीं है।
ये तो सनातन के केतुवाहक वे ऋषि ही है न, जिन्होंने ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का महान उद्घोष किया. जिन्होंने शाश्वत वेदों को जाना। और ‘तत्त्वमसि’ का मन्त्र देकर विविधता की पहचान की. जिन्होंने ‘अमृतस्य पुत्रा वयं’ का उद्घोष करके ज्ञानाधारित सभ्यता को रचा. इन्ही से वे वे अपने आप को और इस देश की सोई चेतना को संपृक्त कर रहे है।
सारांश में कहे तो प्रस्तुत कविता का एकेक अंश सनातन के महात्म्य का उजला संकीर्तन हैं। प्रत्येक आख्यान जातीय गौरव का उद्बोधक है।लेखकदिनेश सूत्रधार
अणुओं- परमाणुओं में फूंका हुआ-
तुम हो महान, तुम सदा महान हो।
ब्रह्म हो तुम’
राष्ट्र पुरूष को विनम्र ऋद्धांजलि
राष्ट्र पुरूष को विनम्र ऋद्धांजलि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर जिन्हें सब प्रेम से श्री गुरूजी कहा करते थे। श्री गुरूजी का जन्म 19 फरवरी,1906 को हुआ था। उनके बचपन का नाम माधव था। बचपन से ही मेधावी माधव ने सभी परीक्षाएं उच्चतम श्रेणी से उतीर्ण की। काशी में अध्ययन के दौरान उनका संपर्क संघ से हुआ। वे नियमित रूप से शाखा जाने लगे।
कुछ समय पश्चात नागपुर लौटने पर उनका सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से हुआ और वे एक दिन चुपचाप बंगाल के सारगाछी आश्रम जाकर स्वामी अखण्डानंद जी से दीक्षा ले ली और तत्पश्चात पूरी शक्ति से संघ कार्य में जुट गये। संघ संस्थापक डॉ.हेडगेवार जी के देहावसान के बाद श्री गुरूजी संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने, श्रीगुरूजी ने संघ को अखिल भारतीय सुदृढ़ अनुशासित संगठन का स्वरूप प्रदान किया। पूरे देश में संघ कार्य बढ़ने लगा।
विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होने वाले श्री गुरूजी ने गांधी हत्या के झूठे आरोप के जहर को भी नीलकण्ठ बनकर धारण किया एवं उन देशवासियों के प्रति मन में कटुता को स्थान नहीं दिया जो अज्ञानता वश कटु वचनों से उनका हृदय छलनी करने से भी नहीं चुकते थे। श्री गुरूजी के आध्यात्मिक स्वभाव के कारण सन्तों के श्री चरणों में बैठने, ध्यान लगाने, प्रभु स्मरण करने, संस्कृत व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करने में उनकी गहरी रूचि थी, इस कारण एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था, जिसे उन्होंने सहर्ष अस्वीकार कर दिया।
राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रबल समर्थक श्री गुरूजी राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की गंभीर चिंता किया करते थे। उनके अनुसार भारत कर्मभूमि, धर्मभूमि और पुण्यभूमि है। यहां का जीवन विश्व के लिए आदर्श है। भारत राज्य नहीं है अपितु यह तो सनातन राष्ट्र है।
एक सन्यासी के रूप में जीवन व्यतीत करते हुए भी अपने मोक्ष के स्थान पर लगभग 33 वर्ष तक अखंड राष्ट्र आराधना करते हुए आज ही के दिन 1973 को श्री गुरूजी अनंत में विलीन हो गए!
समाज में निहित कुरीतियों का निराकरण करते हुए देश की 135 करोड़ आबादी को अभेद्य राष्ट्रभक्ति का कवच पहनाने का भागीरथी संकल्प ही उस महामानव के लिए सच्ची ऋद्धांजलि हो सकती है!
लेखक
गंगा सिंह
युगदृष्टा कबीर; जयंती पर विशेष
5 जून, कबीर-जयंती पर विशेष
कबीर अपने समय और समाज के अद्भुत चितेरे ही नहीं, अपितु कालजयी युगद्रष्टा थे। दूसरे शब्दों में कहूँ तो कालजयी अवधूत थे। कालजयी अवधूत वही होता है, जिस पर बाहरी परिस्थितियों को कोई प्रभाव नहीं पड़े, जो आठों याम फकीराना मस्ती और मौज में मस्त रहे। जो प्रतिकूल-से-परिस्थितियों में भी अपने अंतर से जीवन-रस खींचकर प्रकृति-परिवेश को अपनी सौरभ-संपदा की सौगात दे। वे पलाश की तरह थोड़े समय के लिए खिलकर मुरझा जाने वाले को अच्छा नहीं मानते थे, वे तो हमेशा प्रफुल्लित रखने वाली अंतश्चेतना की जागृति के पैरोकार थे। इसलिए उन्होंने कहा कि-''दिन दस फूला फूलि के खंखड़ भया पलाश।''
कबीर का समग्र दर्शन संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता का गौरव-गान है। वह चित्त को बहिर्जगत से अंतर्जगत के पथ की ओर मोड़ता है। कबीर का आखर-आखर जीवंत भास्वर है। उनका शब्द-शब्द जीवनदायी मंत्र है। उनका हर दोहा युगों-युगों के संचित अनुभवों का सार-संक्षेप है।उपादेयता और सार्वकालिक, महत संदेशों की तुला पर सैकड़ों पृष्ठों के औपन्यासिक ग्रंथ पर उनका छोटा-सा दोहा भारी पड़ता है। यों ही नहीं उन्होंने कहा कि ''जग कहता कागद की लेखी, मैं कहता हूँ आँखिन देखी।'' उनके जैसा निर्भीक और फक्कड़ कवि ही 'आँखिन देखी' सच्चाई और स्वानुभूति को कागज़ पर उकेर सकता है।
कबीर भाव और शिल्प पर समान अधिकार रखते थे। सच है कि भाषा उनकी गुलामी-सी करती प्रतीत होती है। उन्होंने जब जैसा चाहा, भाषा का वैसा प्रयोग किया। वे लिखते भले हैं- '' मसि कागद छुयो नहि, कलम गहि नहीं हाथ''- पर उनके लिखे दोहों, पदों, उलटबाँसियों, कुंडलियों की व्याख्या करने में अच्छे-अच्छे विद्वानों के पसीने छूट जाते हैं। अपने समय में प्रचलित सभी शब्द-रूपों व भाषाओं का उनके साहित्य में प्रयोग मिलता है।
कबीर सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष थे। उन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बाह्याडंबरों पर समान रूप से प्रहार किया। यदि उन्होंने हिंदुओं से कहा कि-
''पत्थर पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहाड़।
तासे तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।''
तो मुसलमानों से भी यह कहने में संकोच नहीं किया कि-
''कंकड़ पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लियो बनाय।
ता पर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।''
मत भूलिए कि वे यह दोहा तब कह रहे थे, जब इस मुल्क पर इस्लामिक सत्ता क़ायम थी।
उन्हें मिली व्यापक जन-स्वीकृति उनकी इसी निर्भीकता, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का परिणाम थी।
ध्यान रहे कि कबीर के एकेश्वरवाद को इस्लाम से प्रेरित-प्रभावित बताने वाले आलोचक-इतिहासकार जान-बूझकर इस सत्य को गौण कर जाते हैं कि कबीर एक निर्गुण-वैष्णव संत थे। वे उपनिषद और शंकर के अद्वैत के अधिक निकट जान पड़ते हैं। उनका रहस्यवाद, कुंडलिनी-जागरण, अनहदनाद आदि नाथों और सिद्धों की साधना-पद्धत्ति के अधिक निकट था। गुरु-महिमा, नाम-स्मरण, सृष्टि के कण-कण में ईश्वर के दर्शन उन्हें सनातन का उद्घोषक सिद्ध करता है, न कि किसी इस्लामिक दर्शन या सुफिज्म का अनुयायी। विघटकारी शक्तियाँ हिंदू-समाज को दुर्बल और विभाजित करने के उद्देश्य से कबीरपंथियों की भी गणना पृथक करती हैं। संप्रदाय और धर्म की भिन्नता को समझना समय की माँग है। कैसी विडंबना है कि समस्त सृष्टि में समष्टिगत चेतना व एकत्व को देखने वाले महापुरुष को भी कथित आधुनिक विद्वान-आलोचक विभेदकारी दृष्टि से देखते हैं! परंपराओं से तोड़ते और आक्रांताओं से जोड़ते हैं।
सत्य यह है कि कबीर ने युगीन यथार्थ का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख दिया। उनकी बेलौस सच्चाई उनके बाद के कवियों-साहित्यकारों में कम ही देखने को मिलती है। कबीर के पथ का अनुगमन सरल नहीं था, इसलिए तो उन्होंने कहा-
''कबिरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ।जो घर फूँके आपणो, चले हमारे साथ।।'' पर अपना घर जलाकर संसार को उजाला देने वाले विरले ही होते हैं। बल्कि यों कहें कि ''कबीर'' ही होते हैं। उन्हें केवल एक कवि मानना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ सरासर अन्याय होगा। वे सही मायने में एक समाजसुधारक, युगद्रष्टा संत थे। अपितु 'संत' शब्द को उन्होंने ऐसी ऊँचाई और निस्पृहता प्रदान की, जिसे छू और जी पाना आधुनिक संतों के लिए संतत्व की उच्चतम-आदर्श कसौटी है।
धन्य है यह भारत-भूमि जिसने देह पर आत्मा, भौतिकता पर आध्यात्मिकता और सांसारिकता पर सार्वकालिक अमरता को प्रश्रय दिया। धन्य है यह भारत-भूमि जहाँ झोंपड़ियों की फ़कीरी ठाठ पर महलों का सुख न्यौछावर किया जाता रहा है। धन्य हैं कबीर जो हरेक की ज़मीर को जिंदा रखने के लिए मशाल बनकर अहर्निश-अनवरत जलना स्वीकार करते हैं।लेखकप्रणय कुमारगोटन, राजस्थान9588225950
''पत्थर पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहाड़।
तासे तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।''
तो मुसलमानों से भी यह कहने में संकोच नहीं किया कि-
''कंकड़ पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लियो बनाय।





























