"तू मेरा कौन लागे रे"
तुझमे ही भगवान देखा
मुझमें जगा इंसान देखा
भरी दुपहरी तपता सूरज
कंठ सूखता जाए रे
तू मेरा कौन लागे रे।मात-पिता प्यारे गुरुजन से
नानी -दादी औरपरिजन से
प्यासे पंथी-पंछी की सेवा के
दिए यही संस्कार रे।
तू मेरा कौन लागे रे।ये मेरा कर्म,न फल की इच्छा
ये मेरी डगर है दिल है सच्चा
ये पानी है करतार खजाना
कोई न प्यासा जाए रे।
तू मेरा कौन लागे रे।न मैं पूछूं जात-धर्म और
ना पूछूं तेरा ठिकाना रे
इस द्वारे पे जो भी आया
प्यास बुझाकर जाए रे।
तू मेरा कौन लागे रे।रचनाकार
"सागर"महेन्द्र थानवी



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