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स्वातंत्र्यवीर सावरकर: एक मूल्यांकन (28 मई, जयंती विशेष|)
आधुनिक राजनीतिक विमर्श में विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे नाम हैं, जिनकी उपेक्षा करने का साहस उनके धुर विरोधी भी नहीं जुटा पाते| वे एक क्रांतिकारी, समाजसुधारक, इतिहासकार, कवि, चिंतक, राजनेता और दार्शनिक के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं| उनका हर रूप ध्यान आकर्षित करता है| हाँ, यह अवश्य है कि जहाँ उनके समर्थकों की बहुतायत है, वहीं उनके कतिपय विरोधियों की भी कमी नहीं| इसलिए यह आवश्यक है कि उनकी जयंती के पावन अवसर पर उनका यथार्थपरक मूल्यांकन किया जाय|
28 मई 1883 को उनका जन्म नासिक, महाराष्ट्र के एक पारंपरिक परिवार में हुआ| महज़ 9 वर्ष की आयु में उनकी माता राधाबाई जी का निधन हुआ और उसके कुछ वर्षों पश्चात उनके पिता भी चल बसे| उनका पालन-पोषण उनके बड़े भाई गणेश सावरकर ने किया| बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी| बल्कि उनके दोनों भाइयों ने भी अपना पल-पल देश की बलि-वेदी पर होम कर दिया और ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों-सितम के शिकार हुए| संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ पूरे परिवार ने देश पर अपना जीवन न्यौछावर कर दिया हो|
1904 में उन्होंने अभिनव भारत नामक संगठन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता-आंदोलन में भाग लेना और हिंदू समाज के भीतर आधुनिक सामाजिक चेतना का विकास करना था|
सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1905 में हुए बंग-भंग के विरोध में स्वदेशी की पैरवी करते हुए विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी| जिस प्रकार तिलक प्रौढ़ों के बीच लोकप्रिय थे, उसी प्रकार सावरकर 1906 तक स्वतंत्रता का स्वप्न सँजोने वाले सभी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो चुके थे|
1906 में वे वक़ालत की पढ़ाई करने लंदन चले गए| वहाँ उनका संपर्क लाला हरदयाल और श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुआ| वे वहीं इंडिया हॉउस में रहकर भारतीय नौजवानों के भीतर स्वतंत्रता की अलख जगाने का प्रयास करने लगे| तमाम पत्र-पत्रिकाओं में राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत उनके लेख छपने लगे|
1 जुलाई 1909 को लंदन में कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी गई| हत्या के आरोपी मदन लाल धींगरा को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके समर्थन में सावरकर जी ने लंदन टाइम्स में लेख लिखा| इधर भारत में भी एक ब्रिटिश कलक्टर जैक्सन की हत्या की गई, जिसका आरोप भी अभिनव भारत की गतिविधियों और विचारों के मत्थे मढ़ा गया| भारत में उनके दोनों भाइयों को गिरफ़्तार कर लिया गया| बड़े भाई को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई| बल्कि मुंबई जेल में दोनों भाइयों का कमरा आस-पास था, पर उनका पारस्परिक संवाद पत्रों के माध्यम से ही हो पाता था|
13 मई, 1910 को लंदन में सावरकर जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया| 24 दिसंबर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा दी गई| 31 दिसंबर 1911 को उन्हें दुबारा आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई| आप कल्पना कीजिए कि ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें 50-50 वर्ष के दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी| भारत क्या, पूरी दुनिया में ऐसी कठोर सज़ा पाने वाला दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता|
वे साहसी इतने थे कि जलमार्ग द्वारा लंदन से भारत लाए जाने के क्रम में उन्होंने अंग्रेजों की गिरफ्त से भागने की योजना बनाई| जहाज़ के बाथरूम में बने छिद्र से उन्होंने समुद्र में छलांग लगा दी और तैरकर तट पर पहुँच गए| फ्रांसीसी भाषा में अपनी बात न समझा पाने के कारण वहाँ उन्हें फ्रांसीसी सुरक्षाकर्मियों ने गिरफ्तार करके पुनः अंग्रेजों को सौंप दिया| उन्हें भारत लाकर मुक़दमा चलाया गया| 7 अप्रैल 1911 को उन्हें कालापानी की सज़ा सुनाते हुए अंडमान निकोबार के सेलुलर जेल भेज दिया गया| उनमें दूरदर्शिता ऐसी थी कि उन्होंने सेल्युलर जेल भेजे जाने से पूर्व उसकी भौगोलिक संरचना को पढ़कर जान लिया था| ब्रितानी हुकूमत दुर्दांत अपराधियों को ही कालापानी की सज़ा सुनाती थी| वीर सावरकर जैसे प्रखर चिंतक, लेखक और स्वतंत्रता-सेनानी को तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने उन अपराधियों की श्रेणी में रखा, क्योंकि उसे आशंका थी कि कहीं और रखने पर वे अपनी लेखनी से जनाक्रोश पैदा कर सकते हैं| वहाँ उस समय केवल जंगल और जेल था, जिसमें बंद कैदियों को तरह-तरह की अमानुषिक यातनाएँ दी जाती थीं| उनसे कोल्हू पिरवाए जाते थे, रस्सियाँ बंटवाई जाती थीं, पत्थर तुड़वाए जाते थे| वीर सावरकर को अकेले प्रतिदिन 30 पौंड यानी बारह किलो तेल निकालने का काम सौंपा गया था| तय मात्रा से थोड़ा भी कम तेल निकालने पर उन्हें भोजन नहीं दिया जाता था| इन दुष्कर कार्यों को करते हुए कई बार उनकी हथेलियाँ लहूलुहान हो उठती थीं| कोल्हू के जुए की रस्सी पीठ में धँस जाया करती थीं| सीलन भरी उन अँधेरी कैद-कोठरियों में ताज़ी हवा और धूप तो दूर, ठीक से खड़े होने और सोने की भी पर्याप्त जगह नहीं हुआ करती थीं| ज्ञातव्य हो कि उस समय राजनीतिक कैदियों के लिए कुछ न्यूनतम मूलभूत सुविधाओं की शर्तें जुड़ी थीं, पर ब्रितानी हुकूमत पर यह सावरकर का खौफ़ ही था कि उन्हें उन न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित रख इतना कठोरतम दंड दिया गया था|
4 जुलाई, 1911 से 21 मई, 1921 तक उन्हें कालापानी की सज़ा काटनी पड़ी| उसके बाद तमाम शर्त्तों के साथ अंग्रेजों ने उन्हें रिहा तो किया, पर रिहा करने के बाद भी वे कई वर्षों तक महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले में नज़रबंद रहे|
परंतु सावरकर मानसिक रूप से दृढ़ संकल्पी व्यक्तित्व थे| उन्होंने रिहाई के पश्चात हिंदुओं में प्रचलित छुआछूत और अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक सुधारवादी आंदोलन चलाया| उन्होंने पतित पावन मंदिर की स्थापना कर उसमें सभी के बेरोक-टोक प्रवेश और पूजा का चलन प्रारंभ करवाया| वहाँ हरिजन पुजारी की नियुक्ति की| घर-घर जाकर हिंदू समाज को एकजुटता का संदेश दिया| वे अपने समय से इतना आगे थे कि उन्होंने ऊँच-नीच की जातिगत भावना को दूर करने के लिए विभिन्न जातियों के मध्य बेटी-रोटी के संबंधों की पैरवी की| 1937 में डॉ आंबेडकर ने पत्र लिखकर अस्पृश्यता उन्मूलन के उनके प्रयासों की मुक्त कंठ से सराहना की|
कालांतर में वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन के प्रणेता और पथ-प्रदर्शक भी| उनका हिंदुत्व कोरी भावुकता या संकीर्णता पर आधारित नहीं रहा| अपितु वह तत्कालीन परिस्थितियों से उपजा उनका तर्कशुद्ध चिंतन व निष्कर्ष था| वे मानते थे कि एक ओर जहाँ मुसलमान और ईसाई मज़हबी धारणाओं के कारण मुख्यधारा से भिन्न मार्ग अपना रहे हैं, वहीं यदि हिंदू समाज संगठित और दोषमुक्त हो जाए तो स्वतंत्रता शीघ्रातिशीघ्र पाई जा सकती है| वे विभाजन के धुर विरोधी और अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे| फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते हुए तत्कालीन वायसराय ने जब भारत-विभाजन का फैसला लिया तो स्वातंत्र्यवीर सावरकर ही उन्हें इस कुटिल निर्णय के सबसे बड़े अवरोधक जान पड़े| उनकी मातृभूमि-पुण्यभूमि की अवधारणा भी व्यापकता लिए हुए थी| आसिंधु सिंधु पर्यंता यस्य भारत भूमिका|
पितृभू पुण्यभुश्चेव स व हिंदू रीति स्मृतः ||
(भारत वर्ष को अपना पितृभूमि और पुण्यभूमि मानने वाले सभी जन हिंदू हैं|)
हिंदुत्व की उनकी परिभाषा में साझी संस्कृति में विश्वास रखने वाले सभी व्यक्तियों के लिए आत्मीय जगह थी| और अंततः जब विभाजन हो ही गया तो उनके अभिनव भारत ने पाकिस्तान से भारत आने वाले विस्थापितों की सर्वाधिक सहायता की| स्वतंत्रता का लक्ष्य हासिल कर लेने के बाद उन्होंने 1952 में अपने अभिनव भारत संगठन को स्वयं भंग कर दिया|
यह वीर सावरकर का सुदीर्घ चिंतन और वस्तुपरक विवेचन ही था कि उन्होंने प्रामाणिक तथ्यों एवं तर्कों के आलोक में 1857 के संघर्ष को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दिलाई| अन्यथा उनसे पूर्व तो अंग्रेज उसे ग़दर या सिपाही विद्रोह का नाम देकर ख़ारिज करते रहे थे| उनकी उस पुस्तक की महत्ता इसी से प्रमाणित होती है कि सरदार भगत सिंह, रास बिहारी बोस, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे प्रखर देशभक्तों ने भी इस पुस्तक के प्रभाव को किसी-न-किसी रूप में स्वीकार किया है| ग़दर पार्टी की तो स्थापना ही उनके विचारों से प्रेरित होकर की गई थी|
स्वातंत्र्य वीर सावरकर की महत्ता इसी से समझी जा सकती है कि स्वयं इंदिरा गाँधी ने उनकी मृत्यु के उपरांत उन पर डाक-टिकट ज़ारी किया था| उनके जेल से छूटने के पश्चात तत्कालीन काँग्रेस नेतृत्व ने अनेक बार उन्हें काँग्रेस में शामिल होने का न्योता भी दिया| परंतु काँग्रेस के तुष्टिकरण की नीति से क्षुब्ध होकर वे ऐसे प्रस्तावों को ठुकराते रहे|किसी एक या दो घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य एवं संदर्भों से काटकर मनमानी व्याख्या करते हुए अपने राष्ट्रनायकों का अपमान मूढ़ता का परिचायक है| जिसके विचारों की प्रखरता, ओजस्विता, तेजस्विता से अंग्रेज थर्राते थे, वर्तमान में उसका अवमूल्यन हमारे राजनीतिक पतन का द्योतक है| सच यही है कि वीर सावरकर एक मौलिक चिंतक, महान देशभक्त और दूरदर्शी राजनेता थे| किशोरों और युवाओं को ऐसे राष्ट्रनायकों से प्रेरणा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि उनके मन में शंका, अविश्वास और तिरस्कार के बीज बोने की स्वार्थयुक्त, दलगत चेष्टा करनी चाहिए|लेखक
प्रणय कुमार
पितृभू पुण्यभुश्चेव स व हिंदू रीति स्मृतः ||
वीर सावरकर के जीवन की प्रमुख घटनाएं
- विनायक दामोदर सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य-योद्धा थे, जिन्हें 2-2 आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से वे राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए।
- वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वातंत्रय इतिहास को 2-2 देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया।
- वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया।
- वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया, फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया।
- वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।
- वीर सावरकर ने राष्ट्रध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया था, जिसे राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने माना।
- वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे,जिन्होने सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया।
- वीर सावरकर ऐसे प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुंचा।
- वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया।
- वीर सावरकर दुनिया के ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंडमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएं लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई 10 हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा।
- सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857' इकलौती पुस्तक थी, जिसने ब्रिटिश शासन को हिला डाला!
- ऐसे राष्ट्रनायक को उनकी 137 वीं जन्मतिथि पर स्मरण कर प्रधानमंत्री ने प्रत्येक भारतीय को गौरवान्वित किया है!
लेखक
गंगासिंह
कोई एक साथ अम्बेडकर और मार्क्स दोनों का वंशज कैसे हो सकता है?
कोई एक साथ अम्बेडकर और मार्क्स दोनों का वंशज कैसे हो सकता है? एक समय में दोनों के प्रति प्रतिबद्धता कैसे निभा सकता है,क्या दोनों में एकता के कोई अन्तःसूत्र है?
सभी को ज्ञात है कि मार्क्स घोर नास्तिक थे तो अम्बेडकर घोर आस्तिक। मार्क्स हिंसक क्रांति के पक्ष में थे तो अम्बेडकर अहिंसक सिद्धांतो में विश्वास करने वाले।
मार्क्स तानाशाही की बुनियाद के हामी थे तो अम्बेडकर लोकतंत्र के हिमायती।
बुद्ध से प्रेरणा लेने वाले बाबा साहब क्या अकरुण और हिंसक क्रांति के पक्षधर हो सकते है? और जगत को भौतिक मानने वाला मार्क्स क्या बुद्ध के अन्तर्ज्ञानात्मक आत्म को स्वीकार कर सकता है?
दोनो के वैचारिक DNA में कोई मेल ही नही है। इसके बाद भी एक खास वर्ग स्वयं को दोनो का संकर उत्पादन बता रहा है।
यदि बाबा साहब का विचार मार्क्स के विचार के इतना निकट था और मार्क्सवाद के प्रति उनका खासा रुझान था तो उन्होंने अंतिम दिनों में क्यों नही अपनाया मार्क्सवाद? दास केपिटल जैसे 'मंजे' हुए शास्त्र को छोड़कर अपभ्रंश-लिखित धम्म-पद को क्यों गुना, एक दर्शन के नाते उन्होंने बौद्ध को क्यों चुना?
उस समय भारत मे कम्युनिज्म का प्रभाव मंडल था, उन्हें तो CPI के पोलित ब्यूरो में जाकर लाल सलाम करना चाहिए था, उन्होंने बौद्ध विहार की राह क्यों ली। उन्होंने तानाशाही- शासन की बजाय सांस्कृतिक चिह्नों से युक्त लोकतांत्रिक संविधान की भूमिका क्यों लिखी?
कुछ भी हो, जमीनी हकीकत यह है कि कम्युनिज्म के विचार में इतनी दयनीयता आ गयी है कि उसे प्रासंगिक बनाये रखने के लिए लोगो को तरह-तरह के चोले पहनकर प्रस्तुत होना पड़ रहा है।
कभी गाँधीवादी खादी तो कभी कबीर का खण्डनवाद। कभी बुद्ध का वेद विरोधी क्रांतिवाद तो कभी लोकायतन का भौतिक मत। हर कोण से प्रयोग करके मार्क्स के भौतिक आत्म के लिए एक आस्तिक शरीर खोज जा रहा है। जिसमें बैठकर वह पश्चाताप कर सके। इसी प्रयोग की एक कड़ी है बाबा साहब के मत के प्रति रुझान के रूप में दिखलाई पड़ती है।
किन्तु खेद है कि परकाया प्रवेश विद्या अब विद्यमान रही नही।
पंथ के अनुयायियों को यह समझना चाहिए कि इस देश मे यदि कम्युनिज्म को स्थापित होना है तो उसे कम्युनिज्म के रूप में ही अपनी तर्कणा प्रस्तुत करनी होगी। भारतीय माटी से उपजे विचार की आड़ लेकर नहीं।
लेखक दिनेश सूत्रधार
धर्मांतरण एक मनोवैज्ञानिक एवं जटिल समस्या
पल-पल सूचनाओं के विस्फोट के दौर में हर चीज बड़ी तेजी से बीत और रीत जाती है| सूचनाओं की दुनिया मे पर्दे से मंज़र बदलते वक्त नहीं लगता| किसी की मृत्यु, हिंसक हत्या या नरसंहार भी जनसंचार माध्यमों और अब समाज के लिए भी केवल एक सूचना है| इसलिए हर मृत्यु, हत्या या संहार के बाद भी हम फ़ौरी तौर पर संवेदनाएँ प्रकट कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं| हम घटनाओं के पीछे के कारणों या परिणामों की मीमांसा नहीं करते, स्थाई समाधान की दिशा में क़दम नहीं बढ़ाते!पालघर जैसी घटना क्यों घटती है? क्या यह ऐसी केवल अकेली घटना थी? इस देश का भोला-भाला, निश्छल वनवासी समाज किसी के प्रति अचानक इतना हिंसक और क्रूर क्यों हो उठता है? क्यों पालघर तहसील के दो गाँवों के लोग अपने गाँव की सीमा पर यह शिलालेख लगा देते हैं कि यहाँ भारत का संविधान लागू नहीं है, यहाँ किसी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है?
इन सबको जानने के लिए हमें धर्मांतरण के कुचक्र व उससे उपजी जटिल एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को विस्तार से समझना पड़ेगा|
1956 में तत्कालीन काँग्रेस सरकार ने धर्मांतरण और उससे उपजी समस्याओं पर विचार करने के लिए नियोगी कमीशन का गठन किया था| इस कमीशन की रिपोर्ट धर्मांतरण और उसके भयावह दुष्परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डालती है| पर हमने इस रिपोर्ट से कोई सीख नहीं ली और भारत में धर्मांतरण का धंधा बड़े जोरों से बेरोक-टोक चलने दिया| निहित स्वार्थों और राजनीतिक फ़ायदों के लिए अनेक दल भी इसका हिस्सा बन गए| धर्मांतरण के पीछे कितना बड़ा नेटवर्क काम करता है इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि पालघर जैसे छोटे से तहसील में 18 ईसाई प्रार्थनाघर हैं|
इन वनवासी लोगों के बीच ये विघटनकारी शक्तियाँ इस प्रकार के विषसिक्त साहित्य वितरित करती हैं, इस प्रकार के विमर्श चलाती हैं कि धीरे-धीरे उनमें अपने ही पुरखे, अपनी ही परंपराओं, अपने ही जीवन-मूल्यों, अपने ही विश्वासों के प्रति घृणा की भावना परिपुष्ट होती चली जाती हैं| उन्हें पारंपरिक प्रतीकों, पारंपरिक पहचानों, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व तक से घृणा हो जाती है| उन्हें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि उनकी वर्तमान दुरावस्था और उनके जीवन की सभी समस्याओं के लिए उनकी आस्था, उनकी परंपरा, उनकी पूजा-पद्धत्ति, उनका पुराना धर्म, उनके भगवान जिम्मेदार हैं| और उन सबका समूल नाश ही उनके अभ्युत्थान का एकमात्र उपाय है| उन्हें उनकी दुरावस्थाओं से उनका नया ईश्वर, उनकी नई पूजा पद्धत्ति ही उबार सकती है| ग़लत ईश्वर जिसकी वे अब तक पूजा करते आए थे का विरोध उनका नैतिक-धार्मिक दायित्व है| यह उन्हें उनके नए ईश्वर का कृपा-पात्र बनाएगा| कभी सेवा के माध्यम से, कभी शिक्षा के माध्यम से, कभी साहित्य के माध्यम से, कभी आर्य-अनार्य के कल्पित ऐतिहासिक सिद्धांतों के माध्यम से उनके रक्त में इतना विष उतार दिया जाता है कि सनातन परंपराओं के प्रतीक और पहचान भगवा से उन्हें आत्यंतिक घृणा हो जाती है| यह घृणा कई बार इस सीमा तक बढ़ जाती है कि वे निरीह साधु-संतों और उनके सहयोगियों के प्राण तक ले लेते हैं|धर्मांतरण के कारण ही स्थानीय समाज में भी सदैव तनाव की स्थिति बनी रहती है| मूल समाज और धर्मांतरित समूह की आस्था व उपासना पद्धत्ति टकराती रहती है| थोड़े-थोड़े अंतराल पर होने वाला छिटपुट तनाव कालांतर में भारी हिंसा का कारण बन जाता है|
कलकत्ता में आनंदमार्गी साधुओं की हत्या, त्रिपुरा में शांति काली महाराज की हत्या, उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या, गुजरात में स्वामी असीमानंद जी पर हुए हमले, और अप्रैल में पालघर में स्वामी कल्पवृक्ष गिरि महाराज व सुशील गिरि महाराज की हत्या के पीछे केवल एक ही कारण था- धर्मांतरण और उससे उपजी घृणा| अभी पालघर हत्याकांड की तपिश कम भी न होने पाई थी कि नांदेड़ में भी साधु समेत दो लोगों की हत्या कर दी गई|यों ही नहीं स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि ''धर्मांतरण मानवता के विरुद्ध क्रूरतम हिंसा है|'' स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि '' हरेक धर्मांतरण के बाद न केवल एक हिंदू कम होता है, बल्कि देश और धर्म का एक शत्रु बढ़ जाता है|'' आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्मांतरण की आड़ में चलने वाले राष्ट्रांतरण के घिनौने खेल पर अविलंब रोक लगे और सभी धर्मों के मध्य सामाजिक सौहार्द एवं एकता के संबंध स्थापित किए जाएँ|#संतों_के_लिए_न्यायभावपूर्ण श्रद्धांजलि| पर सच्ची श्रद्धांजलि तो तब होगी, जब इन निर्दोष संतों के हत्यारों को कठोरतम दंड मिले|प्रणय कुमारगोटन, राजस्थान
कोरोना और पॉजिटिविटी
कोरोना या कोविड-19 का कहर चारों तरफ बरपा हुआ है। विश्वभर में कोरोना पॉजिटिव आए लोगों की संख्या लाखों में है तो इसे मरने वालों की संख्या हज़ारों में। इंसान के जीवन में बहुत कम मौके ऐसे होते है जब वो कुछ "पॉजिटिव" होने पर घबराता है। कोरोना का मामला भी कुछ ऐसा ही है। प्रशासन द्वारा विभिन्न समयों पर जारी बुलेटिन नए कोरोना पॉजिटिव की संख्या जारी करता है और इससे बचने के लिए किए गए लॉक डाउन के कारण घर में बैठा व्यक्ति लॉक डाउन की सार्थकता और इसके न होने की स्थिति में कोरोना की संभावित भीषणता पर मनन अवश्य करता है।
कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित देशों जैसे चीन, अमेरिका और इटली में कोरोना के पहले केस आने के बाद कि स्पीड और भारत में पहले केस आने के बाद से आज दिनांक तक के हालात देखें तो हम पाएंगे कि लॉक डाउन के कारण हमने किस कुशलता से इस वैश्विक महामारी की भयावहता पर काबू पाया है। वरना विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले देश भारत में इसकी भयावहता कहीं अधिक हो सकती थी।
खैर, कोरोना की पॉजीटिविटी से हट हम चर्चा करते है उस पॉजीटिविटी की जो लॉक डाउन के कारण हमारे देश में फैली।
कोरोना की भयावहता, लॉक डाउन में बन्द पड़े काम-धंधों के बीच जब व्यक्ति के सर्वाधिक मानसिक दबाव में होने की परिस्थिति हो सकती है उस विपरीत स्थिति में भी कैसे आनन्द से जिया जा सकता है वो भारतवासियों से सीखने की आवश्यकता है। मानसिक दबाव को पाटकर देश वासियों ने अध्ययन-अध्यात्म एवं तकनीक के सहारे मानसिक उन्नयन के नए सोपान तय करने की ओर कदम बढ़ाए है। इस लॉक डाउन ने देश के हर नागरिक को वो एकांत प्रदान किया है जिसमें वो अपने अतीत के पन्नों को पलट वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में भविष्य की सुनहरी बुनियाद स्थापित कर सकता है।
राजस्थान में लॉक डाउन 22 मार्च से ही शुरू हो चुका था ऐसे में प्रारम्भिक दिनों में एक अज्ञात सा भय हर मन में व्याप्त था। चीन, US और इटली से आ रही मृत्यु की खबरों के बीच लॉक डाउन के प्रारंभिक दिनों का भय कोरोना से बीमारी या मृत्यु का नहीं बल्कि उस बदलाव का था जो आने वाले दिनों में हमें देखना था। ये भय था घर में कैद होने का, मनवांछित और इच्छित कार्य न कर पाने का और सबसे बड़ा भय कमाई के अभाव में जीने का।
लॉक डाउन में रहकर लोगों ने न केवल कोरोना के भय पर विजय पाई अपितु घर में कैद रहने, मनवांच्छित कार्य न कर पाने के भय पर काबू पाया साथ ही साथ अभावों में जीना भी सीखा।
ये लॉक डाउन लोगों की उन रुचियों के पुर्नजन्म का कारण बना जिन्हें लोग आजीविका के फेर में तिलांजलि दे चुके थे। भोग-विलास-आडम्बर और दिखावे के इस युग में जहां सादगी से रहने वाला व्यक्ति यूट्यूब के ऐड की तरह 4 सेंकड बाद स्किप किये जाने योग्य माना जाता था वहीं आज हर व्यक्ति उस डेढ़-दो महीने पहले के वैभवशाली जीवन से समझौता कर चुका है। चाहे में वो धनी से धनी व्यक्ति हो या निर्धनतम, सभी के जीवनशैली में बदलाव आया है। इस लॉक डाउन में सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव रोज कमा कर खाने वाले उस गरीब व्यक्ति पर पड़ा है जो रोजाना भूख से जूझ रहा है इसके बावजूद उस गरीब का जीवन और जीवट असंख्य धनी और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है। लोग मानते है कि यदि अभावों से जूझता गरीब अपने सीमित संसाधनों और अभावों में रहने के अनुभव को अपना अस्त्र और शस्त्र बना भूख से जूझ सकता है तो हम क्यों नहीं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी द्वारा 26 अप्रैल को अपने मन की बात कार्यक्रम में मास्क और अंगोछे को आने वाले दिनों की जीवन शैली का अंग बताया गया था। मुझे लगता है कि न केवल अंगोछा या मास्क बल्कि सादगी भी पुनः हमारे जीवन का अंग होने वाली है। सादगी आने वाले समय का "फैशन ट्रेंड" बन जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
गत एक माह का यदि हम हिसाब लगाए तो कमाई रुकने के साथ लोगों ने अपनी जीवनशैली भी बदल ली। खर्चों में यथासंभव कटौती की, वे कार्य करना सीखें जिन्हें हम समयाभाव का बहाना बना कर टाल जाते थे। "वर्क फ्रॉम होम कल्चर" जैसा कुछ भी होता है ये मुझ जैसे असंख्य भारतीयों को कोरोना के कारण ही पता चला। न्यायालय कार्यवाही की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और लाइव स्ट्रीमिंग पर लंबे समय से बहसें चल रही थी लेकिन इस कोरोना के कारण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई का नया सोपान तय किया है हमारी न्यायपालिका ने। बड़े बड़े संस्थान जिन मीटिंग्स और सेमिनार के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर 5 स्टार होटलों की बुकिंग्स किया करती आज वही मीटिंग और सेमिनार बिना किसी खर्च के वेबिनार और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के रूप में होने लग गए। ऑनलाइन क्लासेज चलने लग गयी, लोग घरों पर किचन गार्डन विकसित करने लग गए, जिनका कुकिंग से कोई वास्ता नहीं रहा वे कुकिंग सीख रहे है तो सिर्फ बाथरूम में अपनी गायन कला का प्रदर्शन करने वाले अब गाना गाकर उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने का हौंसला भी जुटा रहे है।
वे फोन नम्बर जो कभी 50-100 फोन नम्बरों को सहेजने वाली हमारे घर की फोन डायरी में "Important Contact" हुआ करते थे और एंड्रॉयड फोन की लंबी चौड़ी कॉन्टेक्ट लिस्ट में कहीं खो गए थे उन्हें भी खोज कर फोन लगाए जा रहे है।
कोरोना के इस काल में वे प्रवासी भी अब वापस अपनी जन्मभूमि की ओर लौट रहे है जो रोजगार की तलाश में परदेस गए थे। "सोशल डिस्टेंन्सिंग" और "वर्क फ्रॉम होम" जैसे नए कल्चर के बीच परदेस से लौटे इन प्रवासी बंधुओं के रोजगार पर भी प्रभाव पड़ने की प्रचुर संभावना है। ऐसे में ये मौका है पुनः कृषि एवं उन कुटीर उद्योगों की तरफ लौट अपनी जन्मभूमि का कर्ज उतारने का भी है जहाँ अपार धन न भी मिले तो आत्मसंतोष के साथ मातृभूमि पर रहने का मौका तो मिलेगा।
यही वह समय है जब लोगों ने घर में रह कर अपना स्किल डेवलपमेंट किया। सभी ने अपने हुनर को निखारा है। ऐसे में सरकारें भी विद्यालयों और महाविद्यालयों में एक विषय किसी स्किल से जुड़ा भी रख सकती है। जिस चीन से कोरोना वायरस आया है वहां की अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योगों का भी बड़ा योगदान है। इलेक्ट्रॉनिक का बड़ा काम वहां घरों से संचालित हो रहा है।
उक्त परिस्थितियों में कोरोना के बढ़ते पॉजिटिव मामलों के साथ कोरोना के कारण लोगों में आई वैचारिक पॉजीटिविटी को भी राष्ट्र के विकास में काम लेने की आवश्यकता है।
निखिल व्यास












