कोरोना या कोविड-19 का कहर चारों तरफ बरपा हुआ है। विश्वभर में कोरोना पॉजिटिव आए लोगों की संख्या लाखों में है तो इसे मरने वालों की संख्या हज़ारों में। इंसान के जीवन में बहुत कम मौके ऐसे होते है जब वो कुछ "पॉजिटिव" होने पर घबराता है। कोरोना का मामला भी कुछ ऐसा ही है। प्रशासन द्वारा विभिन्न समयों पर जारी बुलेटिन नए कोरोना पॉजिटिव की संख्या जारी करता है और इससे बचने के लिए किए गए लॉक डाउन के कारण घर में बैठा व्यक्ति लॉक डाउन की सार्थकता और इसके न होने की स्थिति में कोरोना की संभावित भीषणता पर मनन अवश्य करता है।
कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित देशों जैसे चीन, अमेरिका और इटली में कोरोना के पहले केस आने के बाद कि स्पीड और भारत में पहले केस आने के बाद से आज दिनांक तक के हालात देखें तो हम पाएंगे कि लॉक डाउन के कारण हमने किस कुशलता से इस वैश्विक महामारी की भयावहता पर काबू पाया है। वरना विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले देश भारत में इसकी भयावहता कहीं अधिक हो सकती थी।
खैर, कोरोना की पॉजीटिविटी से हट हम चर्चा करते है उस पॉजीटिविटी की जो लॉक डाउन के कारण हमारे देश में फैली।
कोरोना की भयावहता, लॉक डाउन में बन्द पड़े काम-धंधों के बीच जब व्यक्ति के सर्वाधिक मानसिक दबाव में होने की परिस्थिति हो सकती है उस विपरीत स्थिति में भी कैसे आनन्द से जिया जा सकता है वो भारतवासियों से सीखने की आवश्यकता है। मानसिक दबाव को पाटकर देश वासियों ने अध्ययन-अध्यात्म एवं तकनीक के सहारे मानसिक उन्नयन के नए सोपान तय करने की ओर कदम बढ़ाए है। इस लॉक डाउन ने देश के हर नागरिक को वो एकांत प्रदान किया है जिसमें वो अपने अतीत के पन्नों को पलट वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में भविष्य की सुनहरी बुनियाद स्थापित कर सकता है।
राजस्थान में लॉक डाउन 22 मार्च से ही शुरू हो चुका था ऐसे में प्रारम्भिक दिनों में एक अज्ञात सा भय हर मन में व्याप्त था। चीन, US और इटली से आ रही मृत्यु की खबरों के बीच लॉक डाउन के प्रारंभिक दिनों का भय कोरोना से बीमारी या मृत्यु का नहीं बल्कि उस बदलाव का था जो आने वाले दिनों में हमें देखना था। ये भय था घर में कैद होने का, मनवांछित और इच्छित कार्य न कर पाने का और सबसे बड़ा भय कमाई के अभाव में जीने का।
लॉक डाउन में रहकर लोगों ने न केवल कोरोना के भय पर विजय पाई अपितु घर में कैद रहने, मनवांच्छित कार्य न कर पाने के भय पर काबू पाया साथ ही साथ अभावों में जीना भी सीखा।
ये लॉक डाउन लोगों की उन रुचियों के पुर्नजन्म का कारण बना जिन्हें लोग आजीविका के फेर में तिलांजलि दे चुके थे। भोग-विलास-आडम्बर और दिखावे के इस युग में जहां सादगी से रहने वाला व्यक्ति यूट्यूब के ऐड की तरह 4 सेंकड बाद स्किप किये जाने योग्य माना जाता था वहीं आज हर व्यक्ति उस डेढ़-दो महीने पहले के वैभवशाली जीवन से समझौता कर चुका है। चाहे में वो धनी से धनी व्यक्ति हो या निर्धनतम, सभी के जीवनशैली में बदलाव आया है। इस लॉक डाउन में सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव रोज कमा कर खाने वाले उस गरीब व्यक्ति पर पड़ा है जो रोजाना भूख से जूझ रहा है इसके बावजूद उस गरीब का जीवन और जीवट असंख्य धनी और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है। लोग मानते है कि यदि अभावों से जूझता गरीब अपने सीमित संसाधनों और अभावों में रहने के अनुभव को अपना अस्त्र और शस्त्र बना भूख से जूझ सकता है तो हम क्यों नहीं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी द्वारा 26 अप्रैल को अपने मन की बात कार्यक्रम में मास्क और अंगोछे को आने वाले दिनों की जीवन शैली का अंग बताया गया था। मुझे लगता है कि न केवल अंगोछा या मास्क बल्कि सादगी भी पुनः हमारे जीवन का अंग होने वाली है। सादगी आने वाले समय का "फैशन ट्रेंड" बन जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
गत एक माह का यदि हम हिसाब लगाए तो कमाई रुकने के साथ लोगों ने अपनी जीवनशैली भी बदल ली। खर्चों में यथासंभव कटौती की, वे कार्य करना सीखें जिन्हें हम समयाभाव का बहाना बना कर टाल जाते थे। "वर्क फ्रॉम होम कल्चर" जैसा कुछ भी होता है ये मुझ जैसे असंख्य भारतीयों को कोरोना के कारण ही पता चला। न्यायालय कार्यवाही की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और लाइव स्ट्रीमिंग पर लंबे समय से बहसें चल रही थी लेकिन इस कोरोना के कारण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई का नया सोपान तय किया है हमारी न्यायपालिका ने। बड़े बड़े संस्थान जिन मीटिंग्स और सेमिनार के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर 5 स्टार होटलों की बुकिंग्स किया करती आज वही मीटिंग और सेमिनार बिना किसी खर्च के वेबिनार और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के रूप में होने लग गए। ऑनलाइन क्लासेज चलने लग गयी, लोग घरों पर किचन गार्डन विकसित करने लग गए, जिनका कुकिंग से कोई वास्ता नहीं रहा वे कुकिंग सीख रहे है तो सिर्फ बाथरूम में अपनी गायन कला का प्रदर्शन करने वाले अब गाना गाकर उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने का हौंसला भी जुटा रहे है।
वे फोन नम्बर जो कभी 50-100 फोन नम्बरों को सहेजने वाली हमारे घर की फोन डायरी में "Important Contact" हुआ करते थे और एंड्रॉयड फोन की लंबी चौड़ी कॉन्टेक्ट लिस्ट में कहीं खो गए थे उन्हें भी खोज कर फोन लगाए जा रहे है।
कोरोना के इस काल में वे प्रवासी भी अब वापस अपनी जन्मभूमि की ओर लौट रहे है जो रोजगार की तलाश में परदेस गए थे। "सोशल डिस्टेंन्सिंग" और "वर्क फ्रॉम होम" जैसे नए कल्चर के बीच परदेस से लौटे इन प्रवासी बंधुओं के रोजगार पर भी प्रभाव पड़ने की प्रचुर संभावना है। ऐसे में ये मौका है पुनः कृषि एवं उन कुटीर उद्योगों की तरफ लौट अपनी जन्मभूमि का कर्ज उतारने का भी है जहाँ अपार धन न भी मिले तो आत्मसंतोष के साथ मातृभूमि पर रहने का मौका तो मिलेगा।
यही वह समय है जब लोगों ने घर में रह कर अपना स्किल डेवलपमेंट किया। सभी ने अपने हुनर को निखारा है। ऐसे में सरकारें भी विद्यालयों और महाविद्यालयों में एक विषय किसी स्किल से जुड़ा भी रख सकती है। जिस चीन से कोरोना वायरस आया है वहां की अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योगों का भी बड़ा योगदान है। इलेक्ट्रॉनिक का बड़ा काम वहां घरों से संचालित हो रहा है।
उक्त परिस्थितियों में कोरोना के बढ़ते पॉजिटिव मामलों के साथ कोरोना के कारण लोगों में आई वैचारिक पॉजीटिविटी को भी राष्ट्र के विकास में काम लेने की आवश्यकता है।
निखिल व्यास



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