भारतवर्ष की यह परम-पावनी वसुन्धरा नररत्नगर्भा है। यहाँ जब-जब मानवता पददलित होने लगती है, मानसिक दासता प्रसृत होने लगती है और सांस्कृतिक चेतना तमसावृत होने लगती है; तब-तब कहीं से किसी निर्मल ज्योत्स्ना का भूतल पर प्रसरण होता है, कोई चिरन्तन दीप प्रज्वलित होता है, दुस्तर जीवनपथ के किसी सनातन कालयात्री का जनन होता है और मानो विराट् चेतना का अवतरण मानव-शरीर में होता है। डॉ भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही एक चैतन्य-दीप हैं जो समाज में अन्तर्बाह्य प्रकाश करते हैं। वे एक अविश्रान्त सनातन कालयात्री हैं जो अपना मार्ग स्वयं खोजते हैं, दूसरों का भी मार्गदर्शन करते हैं, उनके लिए पगडंडी भी बनाते हैं और उस पर अपनी अंगुली पकड़ाकर चलना भी सिखाते हैं।
महापुरुष जन्मना महान् नहीं होते। बाबा साहेब का महापुरुषत्व भी जन्मसिद्ध नहीं, पुरुषार्थसिद्ध - विक्रमार्जित - सत्वार्जित है। एक महार बाल भीम से डॉ अम्बेडकर और बाबा साहेब होने तक की कण्टकाकीर्ण यात्रा कंकर के शंकर होने की यात्रा है जो अति रोमाञ्चकारी भी है और प्रेरणादायी भी है।
धीर-गम्भीर प्रकृति, अप्रतिम प्रतिभा, अद्भुत स्वाध्यायशीलता, उत्कट समाज-हितैषिता, स्वामी विवेकानन्द के दरिद्रनारायण के प्रति समर्पणशीलता, मानापमान में समदर्शिता, परिस्थितिजन्य घोर प्रतिकूलता और विपदा में भी अक्षुण्ण जिजीविषा, सहिष्णुता, ध्येयनिष्ठा और धैर्यशालिता, कौनसा ऐसा अभिलषणीय सद्गुण है जो डॉ अम्बेडकर के विराट् व्यक्तित्व में समाविष्ट नहीं है ?
बाल्यकाल से वर्षों तक समाज में पदे-पदे अपमानरूपी विष का पान करने के बाद भी जब डॉ साहेब के मन में इस समाज के प्रति घृणा नहीं उपजती और वे कभी देश के 'इंटोलरेंट' होने का राग नहीं अलापते (प्रत्युत Country must be placed above community विषयक भाषण में वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि - 'सामाजिक कटुता बाँटती है और नुक़सान पूरे देश, पूरे समाज का होता है'), तो वे हमें निर्विकारता व धीरता की साक्षात् प्रतिमा नज़्र आते हैं - 'विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः।'
बाबा साहेब के बहुमुखी - बहुआयामी व्यक्तित्व का हर आयाम अनोखा है। वे लीक पीटने वालों में नहीं थे।मन, वचन तथा कर्म की एकरूपता (मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्) का इससे सुन्दर उदाहरण और क्या होगा कि एक ओर जब वे कहते हैं कि "मैं किसी भी प्रकार की हीरो-वर्शिप (नायक-पूजा) में विश्वास नहीं करता, व्यक्तिपूजा मत करो", तो दूसरी ओर वे अपना जन्मदिन मनाने वालों का आजीवन विरोध करते हैं और मित्रों द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित ऐसे समारोहों में नहीं जाते हैं। यह प्रतिष्ठा-पराङ्मुखता आज कहाँ दिखती है? जब लोग उन्हें 'संविधान निर्माता' के विरुद से भूषित करते हैं तो वे राज्यसभा में अपने भाषण में साफ कहते हैं कि ''मैं तो बस भाड़े का मजदूर था। जो कुछ मुझे करने के लिए कहा गया, वह मैंने अपनी मर्जी के विपरीत जाकर कर दिया।'' यह विनयशीलता दुर्लभ है।
एक श्रेष्ठ विधिवेत्ता होने के साथ-साथ समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, जननायक, शिक्षक, लेखक, पत्रकार, चिन्तक - क्या नहीं थे बाबा साहेब? पर अधिकांशतः समग्रता में उनका मूल्यांकन नहीं हुआ। प्रायः उन्हें एकांगी दृष्टि से ही देखा गया।दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने धूर्तता व कुछ ने अज्ञानतावश उनका चरित्रांकन एक वर्गहितैषी, सवर्ण-शत्रु, हिन्दुविरोधी या धर्मविरोधी और विद्रोही व्यक्तित्व के रूप में किया है। यह मिथ्या-चित्रण या तो बाबा साहेब की विराट-सर्वसमावेशी-समरसतामूलक-एकात्मवादी दृष्टि को संकीर्ण सिद्ध करने की कुचाल है अथवा यह निरी मूर्खता है।
डॉ अम्बेडकर तो स्वयं कहते हैं कि ''मैं धर्म पर विश्वास रखता हूँ। धर्म के मूल्यों के विना समाज का संघर्ष केवल ईर्ष्यालु व सत्तालिप्सु लोगों का एक क्षुद्र संघर्ष बन जाएगा। धर्म आशा देता है, विश्वास देता है, व्यवस्था देता है, अनुशासन देता है।'' भगवद्गीता के विषय में वे कहते हैं कि - "गीता मेरे सत्याग्रह की प्रेरणा का स्रोत है।"
वे अपने अख़बार के ऊपर 'जय भवानी' लिखते हैं। शताधिक लोगों का यज्ञोपवीत करवाते हैं। वे तो मात्र धर्म के नाम पर व्याप्त उस पाखण्ड का खण्डन करते थे (और पुरज़ोर करते थे) जिसे वे धर्म का मजाक समझते थे।
यह सत्य है कि जीवन के अवसान-काल में उन्होंने बौद्धमत अपनाया; पर उससे पूर्व उनके पास पोप के प्रतिनिधि आए, निज़ाम के लोग भी आए। सबको मना किया कि मैं यदि ईसाइयत में गया या इस्लाम क़बूल किया तो यह अनर्थकारी हो सकता है। इसलिए मैं उसी मार्ग को अपना रहा हूँ जिससे कि इस देश के मूल तत्त्वज्ञान के साथ जुड़ा रहूँ।
रा.स्व.संघ के शिविर में अस्पृश्यता का अभाव देखकर बाबा साहेब वैसे ही अभिभूत हो गए थे जैसे वर्धा के संघ शिक्षा वर्ग में गान्धी बापू हुए थे। संध के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य गुरुजी ने अपने एक पत्र में उनकी स्मृति को नमन करते हुए मुक्तकण्ठ से उनकी प्रशंसा की थी।
कम ही लोग आज जानते होंगे कि बाबा साहेब कश्मीर पर पं. नेहरू की नीति व अनुच्छेद ३७० के विरोध में थे। 'आर्य बाहर से आए' - इस मत को वे पूर्णतः ग़लत और कायरतापूर्ण मानते थे।
किसी तत्त्वज्ञान के परिणामस्वरूप अथवा अपनी सुविधा के लिए (न जाने किस कारण) आज तथाकथित कम्युनिस्ट बाबा साहेब को वर्ग-संघर्ष का पुरोधा मानते हैं, पर वस्तुतः वे श्रमिक के स्वेद-सीकर का मूल्य पहचानने वाले पहले ऐसे श्रमिक-कल्याण-पुरोधा थे जिन्होंने कहा कि श्रमिक, मालिक व सरकार तीनों अलग-अलग नहीं हैं। मज़दूरों का हित, उद्योग का हित और समाज का हित परस्पर भिन्न व विरोधी नहीं है। वे स्वयं को कम्युनिस्टों का कट्टर दुश्मन मानते थे। उनकी एक रोचक कटूक्ति है - "मार्क्सवादी धर्म को अफ़ीम मानते हैं। इनको मक्खन और टोस्ट मिला, मुर्ग़े की टाँग मिली, ये प्रसन्न हो जाते हैं।"
बाबा साहेब 'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्' की मिसाल हैं, 'अप्प दीपो भव' का जीवन्त दृष्टान्त हैं, सामाजिक सामरस्य व सौमनस्य के सन्देशवाहक हैं, अनायकैकनायक हैं और आधुनिक प्राचेतस पुरुष हैं। इस प्रकार की गर्वोक्ति का साहस करने वाले विरले ही लोग मिलेंगे कि -'...मैं चरित्र का पुजारी हूँ। मुझमें कोई दुर्गुण नहीं है, सिवाय इसके कि अध्ययन का बेहद शौक़ है।'
बाबा साहेब की प्रासंगिकता इसी से सिद्ध है कि आज भी हम उनसे असहमत हो सकते हैं, उनकी आलोचना कर सकते हैं, पर उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
डॉ भीमराव अम्बेडकर बाल्यावस्था में संस्कृत पढ़ना चाहते थे, किन्तु अस्पृश्य होने के कारण किसी संस्कृत-शिक्षक ने उन्हें संस्कृत पढ़ाने से मना कर दिया था - यह विषय तो बाबा साहेब के जीवन से सम्बन्धित पुस्तकों में लिखा है और प्रचार में भी है। परन्तु उस समय जाति के कारण अवसर न मिलने पर भी संस्कृताध्ययन की उनकी उत्कट इच्छा मन में सतत बनी रही और सन् १९३० में नागप्प शास्त्री नामक पण्डित से संस्कृताध्ययन का आरम्भ किया।
नागप्पशास्त्री कर्णाटकीय थे। संस्कृत के गम्भीर अध्येता थे। मैसूरु-राजप्रासाद में राजकुमार व राजकुमारी को पढ़ाते थे। गौतम बुद्ध के विचार से प्रभावित होकर संस्कृत में 'बुद्धभागवत' लिखने में उद्युक्त थे। १९२९ में कर्णाटक पधारे पं मदनमोहन मालवीय जी शास्त्री जी द्वारा लिखे जा रहे बुद्धचरित को देखकर प्रभावित हुए और उन्हें मुम्बई आने का आमन्त्रण दिया। इस आमन्त्रण को स्वीकार करके उसी वर्ष मुम्बई आए नागप्पशास्त्री की भेंट वहाँ गान्धी जी और डॉ अम्बेडकर से हुई। डॉ साहेब की संस्कृताध्ययन की अभिलाषा को जानकर उनके आग्रह पर शास्त्री जी ने सप्ताह में तीन दिन संस्कृत-पाठन अंगीकार किया। दो वर्ष तक निरन्तर यह अध्ययनाध्यापन का क्रम चला। तत्पश्चात् शास्त्री जी कार्यवश गुजरात चले गए किन्तु डॉ साहेब उन्हें पुनः मुम्बई ले आए और फिर तीन वर्ष तक वही क्रम; इस प्रकार कुल पाँच वर्ष तक संस्कृताध्ययन किया। संस्कृत में विद्यमान ज्ञानराशि को अनुवाद की बजाय मूलरूप में जानने की ललक को प्रयत्नपूर्वक पूरा किया। यह विषय भी बाबा साहेब के जीवन के अध्येताओं को ज्ञात है, यद्यपि उनके इस विलक्षण संस्कृतानुराग का इतना प्रचार नहीं है।
परन्तु, 'भारत की राजभाषा संस्कृत हो' ऐसा एक संशोधन प्रस्ताव संविधान सभा में रखा गया था और उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वालों तथा उसका मण्डन - समर्थन करने वालों में डॉ अम्बेडकर भी अन्यतम थे, यह विषय तो बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा !
एतद्विषयक प्रमाण के रूप में हिन्दी व अंग्रेजी के तत्कालीन प्रमुख समाचार-पत्रों यथा - THE HINDU (सित.११, १९४९), STATESMEN (सित.११ व १५, १९४९), HINDUSTHAN STANDARD (सित.११, १९४९), THE NATIONAL HERALD (सित.११, १९४९), हिन्दुस्तान (सित.१२, १९४९) इत्यादि के मुखपृष्ठों पर प्रमुखता से प्रकाशित समाचार द्रष्टव्य हैं, जिनकी प्रतिकृतियाँ इस लेख के साथ ही संलग्न हैं।
यहाँ यह जानना तो (संस्कृत-हितकामीजन के लिए) और भी रुचिकर एवं सुखद है कि संविधान सभा में जब राजभाषा के विषय में चर्चा हो रही थी तो डॉ अम्बेडकर व पण्डित लक्ष्मीकान्त मैत्र संस्कृत में धाराप्रवाह वार्तालाप करने लगे। उस संस्कृत वार्तालाप या सम्भाषण का उद्देश्य निश्चय ही संस्कृत की सरलता, व्यावहारिकता व सम्भाषणयोग्यता का प्रतिष्ठापन ही रहा होगा।
तत्सम्बन्ध में 'आज' नामक हिन्दी दैनिक में १५ सितम्बर १९४९ को "डॉ. अम्बेडकर का संस्कृत में वार्तालाप" शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ तथा THE LEADER नामक आंग्ल दैनिक में भी १३ सित. १९४९ को "THEY CONFER IN SANSKRIT" शीर्षक से मुखपृष्ठ पर समाचार प्रकाशित हुआ था। इन पत्रों की प्रतिकृति भी यहाँ संलग्न है।
संविधान सभा में संस्कृतपरक प्रस्ताव के समर्थकों में डॉ. निज़ामुद्दीन मोहम्मद भी प्रमुख थे और उन्होनें भी संस्कृत के पक्ष में भाषण दिया था।
वस्तुतः यह सब नूतन जानकारियाँ बहुत समय बाद प्रकाश में आई हैं। देहली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में शताधिक वर्षों के समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं की माइक्रो फिल्म संरक्षित हैं। उन सबका अन्वेषण - गवेषण करके 'संस्कृत भारती' द्वारा यह सब वृत्त प्राप्त किया गया है, जो 'सम्भाषण सन्देशः' नामक पत्रिका के जून २००३ के अंक में (पद्मश्री चमू कृष्णशास्त्री के एक लेख के रूप में) प्रकाशित भी हुआ था।
इन सब नवप्राप्त प्रमाणों से ज्ञात होता है कि डॉ अम्बेडकर ने न केवल संस्कृत के राजभाषात्व का समर्थन किया था, वे न केवल संस्कृत जानते थे, अपितु वे संस्कृत में बोलते भी थे !
बाबा साहेब संस्कृतभक्त थे व संस्कृत बोलते थे - उनके इस अल्पज्ञात चेहरे से परिचित होना संस्कृतजीवियों, संस्कृतानुरागियों व अन्यों के लिए भी प्रीतिकर तो है ही, प्रेरक भी है।
अस्तु, बाबा साहब जैसे संस्कृत-प्रेमियों के सत्प्रयासों के पश्चात् भी संस्कृतज्ञों की संघटित शक्ति के अभाव में संस्कृत को वह प्राप्तव्य स्थान प्राप्त न हो सका। बस १) संविधान की अष्टम सूची में संस्कृत का प्रवेश हो, २) राजभाषा के रूप में हिन्दी प्रधानतया संस्कृत से शब्दों को ग्रहण करे और ३) केन्द्र सरकार के विविध भागों, मन्त्रालयों व संस्थाओं के ध्येयवाक्य संस्कृत में हों - ये तीन सान्त्वना पुरस्कार (Consolation Prize) ही संस्कृत प्राप्त कर सकी।
बाबा साहेब की संस्कृतप्रीति निश्चय ही गर्वानुभूति का विषय है, पर संस्कृत-विषयक उनका स्वप्न तो अधूरा है; उसकी पूर्ति का दायित्व हमारा है। समाज में सर्वविध समरसता की निर्मिति का महद्भार भी हमारे ही स्कन्धों पर है !
#Ambedkar4Samskrit