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| श्री प्रमोद श्रीमाली |
सदा से कर रहे हैं दुष्ट अत्याचार भारत में,
युगों से ले रहे हैं राम भी अवतार भारत में।
सहे सदियों से कुटिलों के कई दुष्कर्म हमने तो,
मगर लड़कर के जीते हैं हमीं हर बार भारत में।
बहुत धृतराष्ट्र शकुनी के सहारे खेलते बाजी,
सदा करते कन्हैया ही विफल हर वार भारत में।
जहर भर के कई हथियार हम पर फेंकते हैं वे,
समय साक्षी मगर बहती है अमृतधार भारत में।
दवा हो या दुआ संसार में हमने ही बांटी है,
धरा परिवार है पुरखों के ये संस्कार भारत में।
हिमालय फख्र से ऊंचा, गगन से बात करता है,
दिव्य सुरसरित से होते फलित उपहार भारत में।
मगर ये कौन हैं जो पत्थरों से वार करते हैं,
चिकित्सक में है भगवान खुद साकार भारत में।
थूक लो सूर्य पर, चंदा पे, इन सारे सितारों पर,
मलिन मुख ले के दुबकोगे कहां फिर यार भारत में।
यहीं पर जायसी प्रमोद प्रेमाख्यान करते है
बही रसखान के माधुर्य की रसधार भारत में।
रचनाकार
श्री प्रमोद श्रीमाली की कलम से।
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