-
This is Slide 1 Title
This is slide 1 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
-
This is Slide 2 Title
This is slide 2 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
-
This is Slide 3 Title
This is slide 3 description. Go to Edit HTML and replace these sentences with your own words.
भारतीय दर्शन; वसुधैव कुटुम्बकम
मंगल-चाँद पर पहुँचते कदमों और घण्टों-महीनों की दूरियाँ पलों में मापते चमचमाते विमानों के दौर में क़बीलाई मानसिकता से चिपके रहने की समाज के एक तबक़े की जिद्द और जुनून सामान्य मानवी की समझ से परे है| सभ्य समाज ऐसे दुराग्रहों को छोड़कर आगे बढ़ने का मार्ग तलाशता है|
शबरी के राम
"शबरी के राम"
सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण :

एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर फूटे :
"कहो राम! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?"
राम मुस्कुराए :
"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल?"
"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे।
यह भी नहीं जानती थी,
कि तुम कौन हो?
कैसे दिखते हो?
क्यों आओगे मेरे पास?
बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।
राम ने कहा :
"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।”
एक बात बताऊँ प्रभु! भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला ‘मर्कट भाव’ और दूसरा ‘मार्जार भाव’।
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया।
"मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना" (मार्जार भाव)
बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न। उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। (मर्कट भाव)
राम मुस्कुरा कर रह गए।
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया।
"मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना" (मार्जार भाव)
बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न। उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। (मर्कट भाव)
भीलनी ने पुनः कहा :
"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं। तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते?”
राम गम्भीर हुए, बोले :
भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने के लिए ही आया है?” रावण का वध तो, लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता था।
राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था।”
जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि "नहीं, यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"
राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा तभी वह रामराज्य कहलायेगा।"
राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है मां!
माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं।
जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि "नहीं, यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"
राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा तभी वह रामराज्य कहलायेगा।"
राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है मां!
राम ने फिर कहा :
राम की वन यात्रा मात्र रावण युद्ध के लिए ही नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।” राम निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना 'राम' होना है।”
राम निकला है ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”
राम आया है, ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है।”
राम आया है, ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय।”
और
राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।”
सबरी की आँखों में जल भर आया था।
उसने बात बदलकर कहा :
"बेर खाओगे राम?”
राम मुस्कुराए,
"बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया।
राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :
"बेर मीठे हैं न प्रभु?”
"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”
शबरी मुस्कुराईं, बोली :
"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"
✍️अज्ञात
भारतीय सामान-हमारा अभिमान
भारत सरकार द्वारा टिकटोक समेत 59 चीनी apps पर बैन लगाने के फैसले का चहुँओर से स्वागत हो रहा है। इन apps के विकल्प के रूप में कई भारतीय apps उभर कर आ रही है। चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का असर भी पूरे देश में देखा जा सकता है। इसका सबसे बुरा प्रभाव चीनी मोबाइल कम्पनियों पर पड़ा है। Xiomi को तो अपने स्टोर्स पर Made in India के बैनर लगा अपना ब्रांड name छुपाना पड़ा है।
महाभारत काल के प्रसंग वयं पंचाधिकं सतम ध्येय वाक्य को ध्यान में रखकर देश की जनता चीनी वस्तुओं के बहिष्कार पर एकमत हो रही है।
कन्फडरेशन आॅफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) द्वारा 19 जून से 27 जून के मध्य देश में विभिन्न वर्गों के बीच चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार के सम्बन्ध में पूछे गए प्रश्नों के प्रत्युत्तर में शत प्रतिशत (अपवाद को छोड़कर) लोगों ने चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया है।
विभिन्न वर्गों (व्यापारियों, किसानों, उपभोक्ताओं, महिलाओं, विधार्थी व सामाजिक संगठनों) से सर्वे में चीन के साथ चल रहे वर्तमान हालात से संबंधित नौ प्रश्न भी पूछे गए थे,सर्वे में भाग लेने वाले लगभग सभी वर्गो ने चीन के प्रति आक्रोश प्रकट करते हुए, चीन के विरुद्ध और आक्रामक कार्यवाही का समर्थन किया। कैट के इस सर्वे से यह साफ प्रकट होता है कि इस मुद्दे पर सारा देश चीन के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा है और किसी भी कीमत पर अब चीन को सबक सिखाना चाहता है।
इस सर्वे में शामिल लोगों में से 97.8 प्रतिशत लोगों ने यह संकल्प भी लिया कि वह चीनी सामान न खरीदेंगे और न ही बेचेंगे। इसके अलावा अन्य सवालों के जवाब भी लगभग भारत सरकार की वर्तमान नीति को ही पुष्ट करते हैं।
इस सर्वे से उत्साहित होकर कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सर्वे के नतीजों से कैट को अब और अधिक आक्रामकता के साथ देशभर में चीनी वस्तुओं के राष्ट्रीय अभियान 'भारतीय सामान -हमारा अभिमान' को चलाने को बल मिलेगा।
✍️
गंगा सिंह राजपुरोहित
वन कविता
कितने फूल तितलियां पक्षी आंगन में।
देखो कितनी कविताएं होती वन में।
कलुषित कूड़ा जब बाहर हो जाता है ,
कृष्ण अवतरित होते मन वृंदावन में।
एक सितारा धरती को संदेशा दे
सुमन खिले तब सूरज के अभिनंदन में।
सांपों में तो वो ही जहर भरा करता,
सौरभ संग रखे शीतलता चंदन में।
ना जल, ना कुमकुम उपचार न फल मेवा,
सिर्फ समर्पण भाव रखें प्रभु-वंदन में।
उसकी आभा से आभासित जग सारा,
जड़ में जड़वत्, क्रीड़ारत वह चेतन में।
रावण तो मन में अधिकांश रखा करते,
कुछ के ही प्रमोदमय राम यहां मन में।
✍️
प्रमोद श्रीमाली
चीन की काली करतूतों पर विपक्षी दलों की भयावह चुप्पी......!
आज संपूर्ण भारत वर्ष विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, आक्रामक चीन और वहाँ की तानाशाह सरकार की दादागिरी के प्रति आक्रोशित और क्षुब्ध है| 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के पश्चात यह क्षोभ और आक्रोश अपने चरम पर है| भारतीय सैनिकों पर उसका यह हमला सुनियोजित था| बताया तो यहाँ तक जाता है कि चीनी सैनिक लाठी-डंडों पर नुकीले लोहे की तार बाँधकर आए थे और कुछ ने तो चाकू तक छुपा रखा था|
ध्यातव्य हो कि चीन के प्रति देशवासियों का यह क्षोभ और आक्रोश तात्कालिक प्रतिक्रिया या क्षणिक उत्तेजना मात्र नहीं है| वास्तविकता तो यह है कि 1962 में चीन के हाथों तत्कालीन काँग्रेसी नेतृत्व के एकपक्षीय आत्म-समर्पण को भारतीय जनमानस ने कभी हृदय से स्वीकार नहीं किया| उस शर्मनाक पराजय से भले ही तत्कालीन नेतृत्व और उनके उत्तराधिकारियों को कोई खास फ़र्क न पड़ा हो, पर भारत का देशभक्त जनसमुदाय उस अपमान की आग में सदैव जलता रहा है और उस अपमान की आग में घी का काम करती रही है,।
सीमावर्त्ती क्षेत्रों में चीन की लगातार घुसपैठ; थोड़े-थोड़े अंतरालों के पश्चात भारतीय भूभागों का अतिक्रमण, वास्तविक नियंत्रण-रेखा के अति समीपवर्त्ती क्षेत्रों में उसकी सैन्य एवं सामरिक गतिविधियाँ, कभी सियाचीन, कभी नाथुला, कभी डोकलाम तो कभी गलवान में भारतीय सैनिकों के साथ उसकी हाथापाई एवं हिंसक झड़पें|
सच्चाई यह है कि भारत ने भले चीन के साथ हुई तमाम संधियों का वचनबद्धता के साथ पालन किया हो, पर चीन ने कभी भी सहयोग और शांति की किसी संधि का सम्मान नहीं किया| ऐसा नहीं कि उसका यह रवैया केवल भारत वर्ष के प्रति रहा हो, बल्कि उसने अपने सभी पड़ोसी देशों की एकता, अखंडता और संप्रभुता के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ अवश्य किया है, उन पर कभी-न-कभी आँखें तरेड़ी हैं, सीमाओं का अतिक्रमण किया है|
चीन की इन हरकतों और हिमाकतों से जहाँ एक ओर पूरा विश्व आक्रोशित एवं क्षुब्ध है, वहीं अपने कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं का चीन को लेकर रुख़ हैरान करने वाला है| वे चीन के इस विस्तारवादी-आक्रामक रवैय्ये में भी अपने लिए एक अवसर ढूँढ़ रहे हैं|
हर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी एवं विपक्षी पार्टियों को सरकार से प्रश्न पूछने, उसकी आलोचना करने की आज़ादी मिलती है और मिलनी भी चाहिए परंतु भारत इकलौता देश है, जहाँ की विपक्षी पार्टियाँ राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करती हैं, युद्ध-काल में भी अपनी सरकार को घेरती है| ऐसे-ऐसे वक्तव्य ज़ारी करती हैं, जिनका सीधा लाभ देश के दुश्मनों को मिलता है| वे अपनी ही सेना का मनोबल तोड़ती हैं और देश के शक्ति-बोध एवं सामूहिक बल को कमज़ोर करती हैं| करुणा और संवेदना जताने के नाम पर ज़ारी वक्तव्य, चलाया गया विमर्श कब क्रूर उपहास में परिणत हो जाता है, यह कदाचित राजनीति के इन सिद्धहस्त व सत्तालोभी खिलाड़ियों को भी नहीं मालूम!
घोर आश्चर्य है कि इनके अनुयायी और समर्थक-वर्ग बिना सोचे-विचारे उसी विमर्श और उससे निकले निष्कर्ष को आगे बढ़ाते रहते हैं और यदि मालूम होते हुए भी वे ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें ''नर-गिद्ध' कहना अनुचित नहीं! जीवन को उत्सव मानने वाले देश में अब क्या ''मृत्यु का भी सामूहिक उत्सव' मनाया जाएगा?
जो वामपंथी कला, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में भी तथाकथित सामंतवाद, साम्राज्यवाद, असहिष्णुता, अधिनायकवादिता आदि का आए दिन हौआ खड़ा किए रहते हैं, घोर आश्चर्य है कि वे चीन की साम्राज्यवादी, विस्तारवादी आक्रामक एवं तानाशाही रवैय्ये पर एक शब्द भी नहीं बोलते! उन्हें यूरोप-अमेरिका का पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, बाजारवाद, उपभोक्तावाद तो दिखाई देता है, पर विश्व भर के बाज़ार-व्यापार पर कब्ज़ा करने को उद्धत-आतुर साम्राज्यवादी चीन का नहीं! चीन पर उनकी अंतहीन और भयावह चुप्पी क्या अंदरखाने में किसी गोपनीय सांठगांठ की कहानी नहीं बयां करतीं? मत भूलिए कि यह वही दल है जिसने 62 के युद्ध में भी चीन का समर्थन किया था और अपने इस धृष्ट-दुष्ट आचरण के लिए उसने कभी देशवासियों से क्षमा-याचना भी नहीं की|
अब बात देश की मुख्य विपक्षी पार्टी काँग्रेस की| सच तो यह है कि आज वैचारिक स्तर पर भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी काँग्रेस का अपना कोई मौलिक व ठोस वैचारिक आधार बचा ही नहीं है| गाँधी के ठीक बाद से ही उनका वैचारिक क्षरण होने लगा था| नेहरू स्वप्नजीवी रहे और उनके बाद तो धीरे-धीरे काँग्रेस वामपंथ एवं क्षद्म धर्मनिरपेक्षता का मिश्रित घोल बनकर रह गया| काँग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने तो देश को हर मुद्दे पर लगभग पूरी तरह निराश ही किया है| परिवारवाद की वंशबेल पर खिले 'युवा पुष्प' ने कभी अपने सौरभ-सौंदर्य-सरोकार से देश का ध्यान आकर्षित नहीं किया| उनके किसी विचार से उनकी ताज़गी का एहसास नहीं होता| बल्कि चीन या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे गंभीर मुद्दे पर उनका बचकाना बयान उनकी बची-खुची साख़ में भी बट्टा लगाता है|
ऐसे में सत्तारूढ़ दल व उसके नेतृत्व से अपेक्षाएँ और बढ़ जाती हैं| प्रधानमंत्री मोदी पर देश अब भी अटूट विश्वास करता है| देशवासियों को भरोसा है कि प्रधानमंत्री देश की अखंडता एवं संप्रभुता पर आँच नहीं आने देंगें| वे देश की आन-बान-स्वाभिमान की हर हाल में रक्षा करेंगें| वे देश के आर्थिक एवं व्यापारिक हितों को वरीयता देंगें| इस भरोसे को क़ायम रखना उनकी नैतिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है| उन्हें नीति एवं निर्णयों के स्तर पर सजग और सतर्क रहना पड़ेगा| चीन की धमकी एवं दादागिरी से बेफ़िक्र रहते हुए भारत-चीन सीमावर्त्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को मज़बूती प्रदान करने के बहुप्रतीक्षित कार्य को समयबद्ध चरणों में संपन्न करना होगा| साम्राज्यवादी एवं कुटिल चीन को समझने में जो भूल पंडित नेहरू ने की थी, वैसी ही भूल दुहराना या उस पर भरोसा करना देश को नए-नए संकटों में डालना होगा|
सबसे महत्त्वपूर्ण और स्मरणीय बात यह है कि केवल सरकार और राजनीतिक नेतृत्व के भरोसे किसी भी राष्ट्र का गौरव और स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रखा जा सकता अपितु इसके लिए नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदयित्वों का सम्यक निर्वाह करना पड़ता है| निहित स्वार्थों की तिलांजलि देकर राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी पड़ती है| अपितु स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र की राह में सरकार से बड़ी भूमिका सजग-सतर्क-सन्नद्ध नागरिकों की ही होती है| सरकारें संधियों-समझौतों से बँधी होती हैं, जनसाधारण नहीं| स्वदेशी वस्तुओं का व्यापक पैमाने पर उपयोग-उत्पादन कर चीन की आर्थिक रीढ़ तोड़ी जा सकती है| रोज़गार के नए-नए अवसर तलाशे जा सकते हैं| हर हाथ को काम और हर पेट को भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है| परमुखापेक्षिता के स्थान पर स्वावलंबिता का सामूहिक अभियान समय की माँग है|
✍️प्रणय कुमारगोटन, राजस्थान9588225950pranay.knp@gmail.com
उठ रहा है कांग्रेसी षड्यंत्रों से पर्दा
कोरोना को लेकर शुरू किए गए PM केयर्स फण्ड पर प्रश्न उठाने वाली कांग्रेस अब खुद अपने कार्यकाल में PM राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिए दान को लेकर घिरती नज़र आ रही है।
'पीएम केयर्स' फंड में एकत्रित हुई राशि को 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' में स्थानांतरित कर 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' मे 3800 करोड़ बकाया राशि का उपयोग राहत कार्यों में किया जाना चाहिए: कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी pic.twitter.com/QLcXizl3Sk
— Congress (@INCIndia) April 8, 2020
2005 में दुनिया के कुख्यात पूर्व केजीबी जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब से यह उजागर हुआ था कि इंदिरा सहित कांग्रेस के 40% सांसदों को केजीबी से सूटकेस भरकर पैसे मिलते थे। मनमोहन सिंह के शासन काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन के दूतावास, चीनी सरकार से पैसे मिले थे। इसकी पुष्टि फाऊंडेशन की वार्षिक रिपोर्ट से हुई है।
केजीबी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार के लिये इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर रुपए भेजे। नेहरू के चहेते उनकी कैबिनेट में रक्षा मंत्री वीके कृष्णमेनन के चुनाव के लिये केजीबी ने पैसा दिया था और 1970 में चार अन्य मंत्रियों को अलग से धन मुहैया कराया।https://t.co/U62pZqqg9v
— ऑपइंडिया (@OpIndia_in) March 31, 2019
2011 में आतंकियों से कनेक्शन के आरोपी भगोड़े ज़ाकिर नाईक ने भी राजीव गांधी फाऊंडेशन को 50 लाख रुपये का "दान" दिया था।
पंजाब नेशनल बैंक में हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले के अभियुक्त एवं भगोड़े मेहुल चोकसी ने भी 2014-15 में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाले इस फाउंडेशन में अघोषित "दान" किया था।
#Exclusive #Breaking | Mehul Choksi too ‘funded’ Rajiv Gandhi Foundation. pic.twitter.com/hoZgPH2q9B
— TIMES NOW (@TimesNow) June 26, 2020










