कितने फूल तितलियां पक्षी आंगन में।
देखो कितनी कविताएं होती वन में।
कलुषित कूड़ा जब बाहर हो जाता है ,
कृष्ण अवतरित होते मन वृंदावन में।
एक सितारा धरती को संदेशा दे
सुमन खिले तब सूरज के अभिनंदन में।
सांपों में तो वो ही जहर भरा करता,
सौरभ संग रखे शीतलता चंदन में।
ना जल, ना कुमकुम उपचार न फल मेवा,
सिर्फ समर्पण भाव रखें प्रभु-वंदन में।
उसकी आभा से आभासित जग सारा,
जड़ में जड़वत्, क्रीड़ारत वह चेतन में।
रावण तो मन में अधिकांश रखा करते,
कुछ के ही प्रमोदमय राम यहां मन में।
✍️
प्रमोद श्रीमाली



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