वही पुरानी परिभाषाएं ।
अहं भरी सब अभिलाषाएं।
घर से भी घर के लोगों की,
ऊंची हो गई आकांक्षाएं।
मोह जनित मन कैकेयी-सा,
मिली मंथरा-सी कुलटाएं।
भीष्म द्रौण चुप्पी साधे हैं,
सब लाचार हुई द्रुपदाएं।
लंपट शकुनी सफल हो गया,
बांटी गंगा की धाराएं।
वीर कापुरुष बन बैठे सब,
कैसे मिटे राष्ट्र विपदाएं।
मर्यादित मेरे भारत में,
चलीं देखिए नग्न-प्रथाएं।
कलुषित हैं सब क्रिया, विशेषण
औ' विपरीतार्थी संज्ञाएं।
नफरत का कीटाणु कुत्सित,
फिर सफाई अभियान चलाएं।
जोड़-गुणा का पाठ पढ़ें सब,
भाग न करना, नहीं घटाएं।
और विभाजन नहीं चाहिए,
वर्ग बनें सारी संख्याएं।
जन-सिय कैसे रहें सुरक्षित,
लांघ रहीं लक्ष्मण-रेखाएं।
लेकिन अडिग हमें रहना है,
अंगद बनकर पांव जमाएं।
राष्ट्र-विजय का पूत यज्ञ यह,
पग-पग आएंगी बाधाएं।
हों प्रमोदमय जग उजियारा,
अक्षर जीवन दीप जलाएं।
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