स्कूल में बच्चे थे नही, विद्यालय वीरान सा लग रहा था।इस वीरान सुनसान माहौल में एक कविता निकल पड़ी....लॉक डाउन की अवधि में विद्वतजनों के सम्मुख प्रस्तुत है।
कोरोना का रोना भारी
देखो दुनिया भर में है......
झांक रहे है सारे बगले
कैसा संकट घर मे है।
मास्क लगाए घूम रहे हैं
सारे डरे डरे से है।
अनहोनी की आशंका में
चेहरे मरे मरे से है।
बहुत छला धरती को हमने
कुछ तो बदला लेगी वो
रौंद रौंद कर लूटा उसको
कुछ प्रतिशोध तो लेगी वो
प्रकृति अपनी माँ होती थी
नोंच नोंच कर खाया है
दो पैसे की खातिर हमने
खुद ईमान गवायां है।
ताल तलैया नदिया लूटी
पर्वत जंगल नष्ट किए
जहर मिलाया धरती अम्बर
उनको हमने कष्ट दिए।
अपनी ही भूलो का प्रतिफल
आज हमारे सम्मुख है।
सब कातर हो देख रहें है,
महाविनाश को उन्मुख है।
भूल सुधारे, धरा सँवारे ,
शायद क्षमा कर देगी वो
सबकी मैया धरती मैया,
क्षमादान दे देगी वो।
आओ फिर से पेड़ लगाएं ,
नदिया अपने मार्ग चलें
जहर मुक्त हो खेती अपनी,
निर्भय सारे जीव पलें
जितना गोचर लूटा सबने,
फिर से उतना दान करें
कोरोना से शिक्षा लेकर ,
धरती का सम्मान करें।
आओ फिर से सत्कर्मो से ,
नया सवेरा लाएं हम।
अपनी भूल सुधारें मिलकर,
धरती स्वर्ग बनाएं हम ।।
✍️ संदीप जोशी
20 मार्च,2020



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