
"मोमबत्ती जलाने का कार्य अब तक JNU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले लोगों द्वारा JNU के विद्वान प्रोफेसर्स और विशेष प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाता था। चूंकि इन लोगों को आग लगाने का JNU में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन ऐसे खतरनाक काम को देश के प्रधानमंत्री मोदी हल्के में लेकर हर आम-ओ-खास को 5 अप्रैल को रात 9 बजे करने को कह रहे है, वो भी बत्ती बुझा कर।
मोदीजी ने कभी सोचा है कि पिछले 36 साल से JNU में इस विषय पर अध्ययन कर रहा शमसुद्दीन जब अपने 2 साल के पोते को गोद में उठाएगा और उसका पोता उसे पूछेगा की दादूजान आप घर कैसे आए तो वो बेचारा किस मुंह से अपने पोते को कहेगा कि आग लगाकर मोमबत्ती जलाने का मेरा काम देश के प्रधानमंत्री ने छीन लिया?
ये कहानी किसी एक शमसुद्दीन की नहीं बल्कि उन सैंकड़ों छात्रों की है जो पिछले 35-40 सालों से इस काम को करते आए है। मुझे तो चिंता हम जैसे उन पत्रकारों की भी हो रही है जिन्हें नौकरी छिनने के बाद सिर्फ यही काम आता है-आग लगा कर मोमबत्ती जलाना।
मैं मोदीजी से अपील करूँगा की आपने मेरे प्राइम टाइम के टाइम रामायण चला मेरा शो तो बन्द करवा दिया अब कम से कम उन लोगों का तो रोजगार मत छीनों।"
-रबिस कुमार
(सटायर)
मोदीजी ने कभी सोचा है इसका अंजाम क्या हो सकता है? देश की बिजली कम्पनियों में लगे असंख्य इलेक्ट्रिकल इंजीनियर उन 9 मिनट के लिए बेरोजगार हो जाएंगे क्योंकि उन 9 मिनट के लिए उनके पास कोई काम नहीं होगा। उनके साथ ही वो लोग जो इस काम का JNU से विशेष प्रशिक्षण लेकर आए है, क्या ये उनके हितों पर कुठाराघात नहीं होगा?
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