कोई एक साथ अम्बेडकर और मार्क्स दोनों का वंशज कैसे हो सकता है? एक समय में दोनों के प्रति प्रतिबद्धता कैसे निभा सकता है,क्या दोनों में एकता के कोई अन्तःसूत्र है?
सभी को ज्ञात है कि मार्क्स घोर नास्तिक थे तो अम्बेडकर घोर आस्तिक। मार्क्स हिंसक क्रांति के पक्ष में थे तो अम्बेडकर अहिंसक सिद्धांतो में विश्वास करने वाले।
मार्क्स तानाशाही की बुनियाद के हामी थे तो अम्बेडकर लोकतंत्र के हिमायती।
बुद्ध से प्रेरणा लेने वाले बाबा साहब क्या अकरुण और हिंसक क्रांति के पक्षधर हो सकते है? और जगत को भौतिक मानने वाला मार्क्स क्या बुद्ध के अन्तर्ज्ञानात्मक आत्म को स्वीकार कर सकता है?
दोनो के वैचारिक DNA में कोई मेल ही नही है। इसके बाद भी एक खास वर्ग स्वयं को दोनो का संकर उत्पादन बता रहा है।
यदि बाबा साहब का विचार मार्क्स के विचार के इतना निकट था और मार्क्सवाद के प्रति उनका खासा रुझान था तो उन्होंने अंतिम दिनों में क्यों नही अपनाया मार्क्सवाद? दास केपिटल जैसे 'मंजे' हुए शास्त्र को छोड़कर अपभ्रंश-लिखित धम्म-पद को क्यों गुना, एक दर्शन के नाते उन्होंने बौद्ध को क्यों चुना?
उस समय भारत मे कम्युनिज्म का प्रभाव मंडल था, उन्हें तो CPI के पोलित ब्यूरो में जाकर लाल सलाम करना चाहिए था, उन्होंने बौद्ध विहार की राह क्यों ली। उन्होंने तानाशाही- शासन की बजाय सांस्कृतिक चिह्नों से युक्त लोकतांत्रिक संविधान की भूमिका क्यों लिखी?
कुछ भी हो, जमीनी हकीकत यह है कि कम्युनिज्म के विचार में इतनी दयनीयता आ गयी है कि उसे प्रासंगिक बनाये रखने के लिए लोगो को तरह-तरह के चोले पहनकर प्रस्तुत होना पड़ रहा है।
कभी गाँधीवादी खादी तो कभी कबीर का खण्डनवाद। कभी बुद्ध का वेद विरोधी क्रांतिवाद तो कभी लोकायतन का भौतिक मत। हर कोण से प्रयोग करके मार्क्स के भौतिक आत्म के लिए एक आस्तिक शरीर खोज जा रहा है। जिसमें बैठकर वह पश्चाताप कर सके। इसी प्रयोग की एक कड़ी है बाबा साहब के मत के प्रति रुझान के रूप में दिखलाई पड़ती है।
किन्तु खेद है कि परकाया प्रवेश विद्या अब विद्यमान रही नही।
पंथ के अनुयायियों को यह समझना चाहिए कि इस देश मे यदि कम्युनिज्म को स्थापित होना है तो उसे कम्युनिज्म के रूप में ही अपनी तर्कणा प्रस्तुत करनी होगी। भारतीय माटी से उपजे विचार की आड़ लेकर नहीं।
लेखक
दिनेश सूत्रधार
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