भारतीय सनातन मनीषा में औपनिषदिक वाङ्गमय का अनन्य योग है। इसमें सूक्ष्मेक्षिकया विवेचन दृष्टिगोचर होता है और वेदांत का सम्पूर्ण वैशिष्ट्य भी। आचार्य-शिष्य संवाद से अमृत-निःसृति होती है। आचार्य, जिनके विषय में कहा जाता है --
अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
वैसे तो सभी प्रमुख-सुप्रथित उपनिषद् मुझे प्रिय हैं लेकिन कठोपनिषद् से विशिष्ट लगाव है। यह अकारण नहीं, इसलिए क्योंकि मैंने सर्वप्रथम इसे ही पढ़ा था।
इसमें गवैष्णाधिक्य और उर्ध्वेच्छा का उत्कट प्रकटन अवस्थित है। इच्छा अद्भुत चीज़ है। सृष्टि रचना के लिए जितने कारक प्रयुक्त हुए--इच्छा उनमें सर्वप्रथम थी। नासदीय सूक्त कथन करता है -- कामस्तदग्रे! इच्छा का प्रश्नाकुल स्वरूप इसके मूल में है। इसमें सनातन की शोधन प्रक्रिया का शाश्वत उद्घोष है।
राजस्थान पत्रिका के मुख्य पृष्ठ के बायें शीर्ष पर एक सूक्ति छपती है -- य एषु सुप्तेषु जागर्ति! मेरी जिज्ञासा यहीं से अध्ययनार्थ प्रवृत्त हुई।
कठोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद शाखा से सम्बद्ध है। इसका प्रणयन मुनि वैशम्पायन के शिष्य आचार्य कठ ने किया। इसमें दो अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियां हैं, जिनमें उद्दालक-आत्मज नचिकेता और यम के बीच संवाद है।
तत् कस्मै मम् दास्यसि? इतना दयनीय प्रश्न? लेकिन आकुल हृदय से उपजा नितांत आवश्यक-उत्कंठित और जिज्ञासु प्रश्न !
पिता नचिकेता को यम को सौंप देते हैं। तीन दिन तक वह निराहार यम-द्वार पड़ा रहा। उसे अन्न की नहीं जिज्ञासा की भूख थी। उसे पानी की प्यास नहीं थी क्योंकि वह ज्ञान-पिपासु था।
वह तीन वर मांगता है यम से। संक्षेप में -- पहला, वह कहता है कि मेरी जब निकेतन-वापसी हो, तब मेरे पिताजी मुझे अपना गुस्सा छोड़ पहले की ही तरह अपनाएं। दूसरा- अग्नि विषयक ज्ञान। तीसरा - मृत्यु पश्चात आत्मा का क्या होता है?
तीसरे प्रश्न का प्रत्युत्तर सहज नहीं मिला नचिकेता को। इस प्रश्न का उत्तर देने की बनिस्पत यम ने उसे विभिन्न प्रलोभन दिये। राज्य,धन और अकूत ऐश्वर्य भी उसे नहीं डिगा पाया। वह अटल रहा। और तीसरा वर मांग लेता है --
"येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय:॥ "
नचिकेता स्वयं कथन करता है - न वित्तेन् तर्पणीया मनुष्यः!
बृहदारण्यक उपनिषद् में ऐसा ही उल्लेख आता है। याज्ञवल्क्य का कथन -- अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन " अर्थात् " वित्त से अमरत्व को नहीं प्राप्त किया जा सकता। तब मैत्रैयी कहती है -- येनाहं नामृता स्याम किमहं तेन कुर्याम्’ अर्थात् " जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी?"
इति नमस्कारांते !
लेखक
प्रवीण मकवाणा
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