कृष्ण है...
नवरस में शृंगार कृष्ण है।
ऋतु मधु की मनुहार कृष्ण है।
होंठों पर मुस्कान मनोहर,
आंखों में अंगार कृष्ण है।
मोर मुकुट पीताम्बर साजे,
वैजयंती गल हार कृष्ण है।
मर्यादामय राम सदा ही,
लीलामय अवतार कृष्ण है।
षोडश कला, ज्ञान, नीति के,
उत्तम नर साकार कृष्ण है।
छन्दों में है छंद अनुष्टुप,
औ' उपमालंकार कृष्ण है।
मधुराधर, गीता के गायक,
जगती के आधार कृष्ण है।
ब्रजमंडल में सभी नारियां,
नर वह एक हमार कृष्ण है।
एक रूप राधा संग नाचे,
गोपी संग हजार कृष्ण हैं।
धेनु संग विचरे नंदलाला,
बन उपवन उपहार कृष्ण है।
पेड़ों में पीपल प्रमोदमय,
हरिप्रिय हरसिंगार कृष्ण है।
रचनाकार
प्रमोद श्रीमाली
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