शीर्षक पढ़कर आपका चौंकना स्वभाविक है कि एक शिक्षक यह कह रहा है -स्कूल मत भेजना।
आप ठीक समझ रहे हैं एक शिक्षक हूँ इसीलिए कह रहा हूँ कि अपने अबोध शिशु को छोटी सी उम्र में बहुत जल्दी स्कूल मत भेजना । उसे कम से कम उसे 4 वर्ष का तो हो जाने दीजिए।
परीक्षा परिणामो का दौर समाप्त हो गया है और नए सत्र की तैयारियां प्रारंभ हो गई है। बाजार में ढाई -तीन वर्ष के बच्चो के लिए स्कुल बेग और पोशाक खरीदते युवा अभिभावक दिखने लगे हैं।
घर में बच्चे के जन्म के साथ ही इस विषय पर विचार विमर्श प्रारंभ हो जाता है कि कौनसी स्कूल में भेजना है? कब स्कूल भेजना है?
"कौन सी स्कूल भेजना है?" इस पर तो परिवारों में बहुत चिंतन-मनन होता है, पर "कब स्कूल भेजना है?" इस पर जरा भी विचार नहीं करते। पूरी निर्दयता से आजकल के अभिभावक अपने दो-ढाई वर्ष के बच्चों को भी स्कूल भेजने की तैयारी में है। पता नहीं किस बात की होड़ में लगे हैं। पूछने पर बताते हैं आसपास के उन-उन परिवारों के बच्चे जो 2-ढाई वर्ष के हैं, स्कूल जाने लगे हैं इसलिए हमें भी भेजना है ।
कब तक दूसरों की नकल करते रहेंगे, अपना खुद का एक श्रेष्ठ उदाहरण क्यों नहीं रखते ।
लोग आपको देखकर अनुसरण करें कि देखिए उनका बच्चा 5 साल का हो कर स्कूल जाने लगा है। अत्याधुनिक परिवारों में तो 5 वर्ष में एडमिशन का कहते हैं तो हंसने का माहौल बन जाता है। उन्हें लगता है यह कोई मजाक है। पर वास्तव में बालक को विद्यालय भेजने की आयु पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अक्सर पेरेंट्स सोचते हैं कि बच्चों को ढाई साल की उम्र होते ही प्ले स्कूल में डाल दें. ताकि बच्चों कुछ सीख जाएगा. बच्चों को इंटरव्यू के लिए तैयार करने लगते हैं. छोटे बच्चों को एडमिशन की रेस में शामिल करने के लिए तैयार करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं ये बच्चों के लिए ठीक नहीं है. जी हां, सारे शिक्षा मनोवैज्ञानिक और तमाम शोध भी यही कहते है।
कुछ समय पूर्व हुए एक रिसर्च के मुताबिक, बच्चों को जल्दी स्कूल भेजने से उनके व्यवहार पर दुष्प्रभाव होता है. शोध के मुताबिक, बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र जितनी ज्यादा होगी बच्चे का खुद पर उतना ही ज्यादा आत्मनियंत्रण होगा और बच्चा उतना ही हाइपर एक्टिव होगा।
स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा की गई इस शोध के मुताबिक, बच्चों को 5 की उम्र के बजाय 6 या 7 की उम्र में स्कूल भेजना चाहिए. रिसर्च में पाया गया कि जिन बच्चों को 6 साल की उम्र में किंडरगार्डन भेजा गया था. 7 से 11 साल की उम्र में उनका सेल्फ कंट्रोल बहुत अच्छा था।
साइक्लोजिस्ट मानते हैं कि सेल्फ कंट्रोल एक ऐसा गुण है जिसे बच्चों के शुरूआती समय में ही डवलप किया जा सकता है. जिन बच्चों में सेल्फ कंट्रोल होता है वे फोकस के साथ आसानी से किसी भी परेशानी या चुनौतियों का सामना कर पाते हैं।
स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता थॉमस डी और हैन्स हेनरिक सीवर्जन ने अपनी इस शोध के नतीजों के लिए दानिश नैशनल बर्थ कोवर्ट डीएनबीसी से डाटा इकट्ठा किया. रिसर्च के दौरान 7 साल के बच्चों की मेंटल हेल्थ पर फोकस किया गया. इसके लिए तकरीबन 54,241 पेरेंट्स का फीडबैक लिया गया. वहीं 11 साल की उम्र के बच्चों की मेंटल हेल्थ के लिए 35,902 पेरेंट्स के फीडबैक लिए गए।
शोध के नतीजों के दौरान पाया गया कि जिन बच्चों ने एक साल देर से स्कूल जाना शुरू किया था उनका हाइपरऐक्टिव लेवल 73 पर्सेंट बेहतर था।
अभी कुछ समय पहले एक बड़े समाचार पत्र में एक खबर छपी थी जिसमें दुनिया के विभिन्न विकसित देशों के बच्चों की विद्यालय में प्रवेश की आयु दी हुई थी । कुछ देशों में 5 वर्ष , कुछ में 6 वर्ष और एक दो देश में तो 7 वर्ष की उम्र में विद्यालय में प्रवेश की बात बताई गई ।
भारतीय दर्शन भी यही मानता आया है । हमारे यहां प्राचीन काल से विद्या आरंभ करने की अर्थात औपचारिक शिक्षा प्रारंभ करने की आयु 7 वर्ष मानी गई है ।
उससे पूर्व औपचारिक शिक्षा प्रारंभ करने से शिक्षा और शिक्षार्थी दोनों की हानि होती है। 7 वर्ष की आयु से प्रारंभ करके 25 वर्ष की आयु तक अध्ययन करना अर्थात कुल 18 वर्ष तक का अध्ययन। पर्याप्त समय हैं यह। वर्तमान समय के हिसाब से देखें तो स्नातकोत्तर (PG) तक के अध्ययन के लिए 17 वर्ष चाहिए। फिर इतनी जल्दी बाजी क्यों?
आप सभी से निवेदन है, अपने परिवार में, अपने मिलने वालों की परिवार में यदि कोई बालक विद्यालय में प्रवेश करने के निकट है तो उन्हें बताइए 5 वर्ष से पहले विद्यालय में प्रवेश न कराएं। बहुत जल्दी है तो 4 वर्ष की आयु में बालवाड़ी या किंडर गार्डन में प्रवेश दिला सकते हैं।
इससे कम आयु में बच्चों को स्कूल भेजने वाले अभिभावक निसंदेह उन बच्चों के दुश्मन ही हैं जो अज्ञानतावश, मूढ़ता वश, अहंकार वश या होड़ाहोडी के चक्कर में फस कर अपने बच्चों का बचपन तो खराब कर ही रहे हैं उनका भविष्य भी खराब कर रहे हैं। और साथ साथ अभिभावक अपना स्वयं का भी भविष्य ....??
शास्त्रीय नियम तो 7 वर्ष का ही है बहुत आवश्यक हुआ तो 4 या 5 वर्ष। इससे कम उम्र में भेजने की जल्दीबाजी तो कतई नहीं करनी चाहिए। जैसे सड़क पर चलने के नियम बने हुए हैं , सब उनका पालन करेंगे तो दुर्घटनाएं नही घटेगी किंतु हम हेलमेट भी नहीं पहनेंगे, हाथ छोड़कर चलाएंगे या बहुत तेज गति से लाएंगे चलाएंगे तो दुर्घटना घटनी ही है ।
ऐसे ही शिक्षा के बारे में भी हैं, शिक्षा प्राप्त करने के उम्र के बारे में शास्त्रीय वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक नियमों को नहीं मानेंगे तो दुर्घटनाएं घटनी हीं है, विकृतियां आनी ही है और बालको में यह विकृतियां बढ़ते-बढ़ते परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या तक पहुंच जाती है ।
स्कूल में जाने पर बच्चे को नए अनुभवों, शारीरिक, सामाजिक, व्यावहारिक और एकेडमिक चुनौतियों और अपेक्षाओं में सामंजस्य बिठाना होता है और इनका सामना करना होता है। इसलिए अगर बच्चा इनके लिए तैयार नहीं है और उसे इनका सामना करना पड़े तो इसका बहुत नकारात्मक असर बच्चे पर पड़ता है। उसे स्कूल और पढाई से चिढ हो सकती है। वह पढाई में कमजोर रह सकता है। वह तनाव में भी आ सकता है और उसे अवसाद घेर सकता है।
5 वर्ष पूर्व बालक को जो पढ़ाना है, घर पर ही पढ़ाई हो। "परिवार ही विद्यालय "की संकल्पना का पालन करना चाहिए। ढाई-3 वर्ष का बालक तो औपचारिक शिक्षा के लिए कतई तैयार नहीं होता। न शारीरिक रूप से ना मानसिक रूप से। और इस बात को दुनिया के सारे शिक्षा शास्त्री और मनोवैज्ञानिक मानते हैं।
अतः निवेदन है कि यदि परिवार को बचाना है , समाज को बचाना है ,संस्कृति को बचाना है, देश को बचाना है तो बालक के बचपन को बचाइए ।
4- 5 वर्ष तक उसे घर में ही खेल-खेल में सीखने दीजिए । उसका शारीरिक और मानसिक विकास होने दीजिए। यदि यह ठीक हो गया तो दुनिया की सारी शिक्षा ग्रहण करने में उसे बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा।
पुनः निवेदन हैं कि चार वर्ष से छोटी आयु के बच्चो को स्कुल मत भेजना।
संदीप जोशी
जालोर
jaloresjoshi@gmail.com
9414544197
(लेखक शिक्षक है।)




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