आज दैनिक भास्कर में पाली के जिला कलेक्टर का साक्षात्कार छपा जिसमें उन्होंने उनपर योग्य लोगों की अनदेखी कर अपने चहेतों और सिफारिशवालों को पुरस्कृत करने को लेकर पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने जवाब दिया "क्या फर्क पड़ता है!"
कलेक्टर साहब के इस व्यक्तव्य पर सामाजिक कार्यकर्ता निमित लश्करी ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह दी-
स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर जिला प्रशासन द्वारा हर बार लगभग 100 लोगों का सम्मान किया जाता है। प्रशासन की ओर से दिखावें के लिये एक चयन प्रक्रिया भी अपनाई जाती है एवं तत्पश्चात लगभग 60-70 सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों की एवं बचे हुए सिफारिश से आए लोगों को पुरस्कार देने का एक क्रम पिछले लंबे समय से जारी है।
स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस वैसे तो अधिनायकवाद पर लोकतंत्र की विजय के पर्व है जिन्हें संपूर्ण राष्ट्र सेलिब्रेट करता है लेकिन पाली जिला प्रशासन द्वारा पिछले लंबे समय से इस पर्व पर होने वाले सम्मान समारोह को मात्र प्रशासनिक अधिकारियों एवं नेताओं के चहेतों का सम्मान समारोह बना कर पुनः नव अधिनायकवाद की परंपरा बना दी है।
जिला स्तर पर आयोजित होने वाले इस सम्मान समारोह में वैसे तोे जिले कि जनसंख्या लगभग 20 लाख है एवं सरकारी कर्मचारियों की संख्या इस संपूर्ण संख्या के 2-3 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी लेकिन जिला स्तर पर आयोजित होने वाले इस समारोह में पुरस्कृत होने वाले सरकारी कर्मचारियों की संख्या 60 से 70 प्रतिशत होती है जिससे स्पष्ट है कि चयन समिति के अधिकारियों का दृष्टीकोण आमजन से इस पुरस्कार के योग्य व्यक्तियों के चयन की बजाए साल भर अपने आसपास रहने एवं बैठकों में अधिकारियों की हां में हां मिलाने वालों का उपकृत करने में अधिक है।
देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किसी समय एलीट वर्ग के लिये ही माने जाने वाले पद्म पुरस्कारों को एक गांव की झोंपड़ी में रह कर रेहडी चलाने वाले तक पहुंचा दिया लेकिन उसी झोंपडी में रह कर पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले उस योग्य व्यक्ति की पहुंच जिला कलेक्टर तक न होना उसे जिला स्तरीय पुरस्कारों में सम्मान पाने से वंचित करती है। ये प्रदर्शित करती है कि हम लोकतंत्र में तो पहुंच गये लेकिन हमारे प्रशासनिक अधिकारी आज भी अंग्रेजों के समय की अधिनायकवादी व्यवस्था से निकल नहीं पाए है।
इस बार जिला प्रशासन ने एक ऐसे अधिकारी को पुरस्कृत किया जिसके कारण आप और हम पाली को अपना शहर बताते हुए हिचकिचाते है। पाली शहर की धूल उडाती खुदी हुई सडकें एवं जगह जगह रूके विकास कार्य जिस विभाग की अकर्मयण्ता का परिचायक है उसी विभाग के उच्चाधिकारी को पुरस्कृत करके आपने जनता के सामने ये स्पष्ट किया कि शहर की इस हालात का जिम्मेदार सिर्फ रूडीप नहीं है बल्कि रूडीप की इस अकर्मण्यता को जिला कलेक्टर, पाली की पूरी शह है।
धन्य है जिला प्रशासन जिसने उस अधिकारी को सम्मानित कर ऐसे अनेक योग्य लोगों को ये विश्वास दिलाया ये पुरस्कार उन्हें उनकी योग्यता पर नहीं मिल सकता बल्कि उन्हें जिला प्रशासन की चाटुकारिता भी करनी होगी।



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