देश का प्रथम नागरिक गैर राजनैतिक तो शहर का क्यों नहीं!
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| निखिल व्यास |
गत 16 नवम्बर को चुनाव सम्पन्न होने के बाद से 19 की मतगणना एवं बाद में 26 और 27 नवम्बर को सम्पन्न निकाय प्रमुख एवं उप प्रमुखों के चुनाव तक एक शब्द जो सभी जगह चर्चा में रहा वो था "बाड़ेबन्दी".
इस बाड़ेबन्दी में शहरों के होने वाले प्रथम नागरिक भी कैद थे और उन्हें चुनने वाले पार्षद भी।
इन चुनावों के समानांतर ही एक घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति में भी चल रहा था। हालांकि वहां मसला राज्य सरकार बनाने का था और दलबदलू कानून के आलोक में तोड़फोड़ करना किसी भी राजनैतिक दल के लिए इतना आसान नहीं होता जितना नगरीय निकायों में होता है।
आगामी 1-2 महीनों में प्रदेश में पंचायती राज के चुनाव भी होंगे। इन चुनावों में जहां पंच-सरपंच के चुनावों में राजनैतिक दलों का कोई रोल नहीं होता वहीं पंचायत समिति एवं जिला परिषद में राजनैतिक दलों द्वारा सिम्बल दिए जाएंगे।
गांवों में पंच-सरपंच के चुनावों में राजनैतिक दलों के सीधे हस्तक्षेप न होने का बहुत बड़ा लाभ गांवों को मिलता है जहां केंद्र, राज्य, जिला परिषद एवं पंचायत समिति में किसी भी दल का शासन हो, गांव के विकास में कम से कम राजनैतिक कारणों से भेदभाव नहीं होता इसके उलट शहरी निकायों में चुनाव के साथ ही राजनैतिक दलों में पार्षदों की तोड़फोड़ एवं बोर्ड बनने के बाद तेरा-निकाय-मेरा-निकाय वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
शहरी निकायों के प्रमुख, चाहे वो अध्यक्ष हो, सभापति हो या महापौर, शहर के प्रथम नागरिक कहलाते है। देश के प्रथम नागरिक के रूप में महामहिम राष्ट्रपति, राज्य के प्रथम नागरिक के रूप में राज्यपाल संवैधानिक पद होने के साथ साथ गैर राजनैतिक पद माने जाते है वही शहरी निकायों में यही पद विशुद्ध राजनैतिक पद हो जाता है। ऐसे में "प्रथम नागरिक" जैसे विशिष्ट पद का सम्मान कई बार केवल राजनीति के कारण ही खतरे में पड़ जाता है।
क्या देश के प्रथम नागरिक की तरह यह पद गैर राजनैतिक नहीं हो सकता है? क्या गांवों की सरकारों की तर्ज पर यहां भी राजनैतिक दलों के नाम एवं सिम्बल को निषेध नहीं किया जा सकता! यदि ऐसा कोई कदम सरकार उठाती है तो न केवल "बाड़ाबंदी", "तोड़फोड़" और "खरीद फरोख्त" जैसे शब्दों से शहरी निकायों को आज़ादी मिलेगी वही इन शब्दों को राजनीति की शैशवावस्था में सीखने से राजनीति में आने वाली नई पीढ़ी बच जाएगी।




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